Up Kiran, Digital Desk: वह दिन अब बीते ज़माने की बात हो गई जब जहानाबाद रेलवे स्टेशन से बस दस किलोमीटर दूर सदर प्रखंड का सिकरिया गाँव नक्सलवाद के गढ़ के रूप में जाना जाता था। एक ऐसा वक्त था जब यहाँ प्रशासन का नहीं बल्कि नक्सलियों का फरमान चलता था। भाकपा माओवादी और पीपुल्स वार जैसी ताकतें हर चुनाव में वोट बहिष्कार का नारा देती थीं। अगर किसी ने वोट डालने की जुर्रत की तो उसे सज़ा मिलती थी। माफ़ी माँगनी पड़ती थी और जुर्माने के तौर पर उठक-बैठक भी करनी पड़ती थी।
अमन जी प्रसाद जैसे गाँव के बुज़ुर्ग बताते हैं कि नब्बे के दशक तक तो हर चुनाव में खुलेआम वोट बहिष्कार की घोषणा होती थी। कुछ बहादुर लोग छिपकर वोट डालने जाते थे। अगर नक्सलियों को पता चल जाता था कि अमुक व्यक्ति ने वोट दिया है तो उसे दंड ज़रूर मिलता था।
बेखौफ होकर वोट डालती हैं नई पीढ़ी की महिलाएँ
लेकिन सिकरिया गाँव अब पूरी तरह बदल चुका है।
गाँव के सामुदायिक शेड में आज जीविका से जुड़ी 20-25 महिलाएँ इकट्ठा हैं और पैसे के लेन-देन का हिसाब-किताब कर रही हैं। इन्हीं में से एक हैं सुमित्रा देवी। वो आत्मविश्वास से भरी आवाज़ में कहती हैं, "अब कोई डर नहीं लगता। अब हम सीना तानकर वोट देने जाते हैं।" वो बताती हैं कि पहले हिंसा और गोली चलने का डर था। वोट डालने से रोका जाता था। केवल कुछ बुज़ुर्ग महिलाएँ ही डरते-डरते वोट डाल पाती थीं। पर साल 2005 के बाद हालात बदले हैं। सुमित्रा देवी गर्व से कहती हैं कि अब तो नई बहुएँ भी वोट डालने जाती हैं।
जहानाबाद जिले में 11 नवंबर को मतदान होने वाला है और इस बार पुरुषों से ज़्यादा उत्साह महिलाओं में दिख रहा है।
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