Corruption in UPFC . वन निगम में हो रहे भ्रष्टाचार के पीछे वो कौनसी ताक़त है जो करोड़ों के फर्जीवाड़े का जिम्मेदार है, ये सवाल अब खुद ही सवाल बनकर रह गया है। सीधे तौर पर देखें तो इस सारे खेल का जिम्मेदार एमडी अरविन्द कुमार सिंह और उनकी एक टीम है जो एक संगठित गिरोह की तरह सुनियोजित तरीके से बड़ी ही सफाई से भ्रष्टाचार के खेल को अंजाम दे रही है। इस बाबत वन निगम के प्रबंध निदेशक ने अपनी रहस्य्मयी चुप्पी को क्षणिक रूपसे तोडा है। उन्होंने बताया कि "वो करप्ट नहीं हैं", उन्होंने बताया कि "मैंने 7 साल तक मुख्यालय पर ddo की सर्विस दी है, कहीं एक पैसे का हेर फेर नहीं हुआ, चाहें तो पता करें , HQ पर मैंने एक पैसे की चाय नहीं पी, बल्कि पिलाई है "
अब ऐसे में ऐसी कौनसी ताक़त है जो वन निगम के भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार है ये बड़ा सवाल है। हालाँकि एमडी वन निगम अरविन्द कुमार सिंह भले ही खुद को करप्ट न होने की सफाई दे रहे लेकिन निगम में उनकी तैनाती के बाद से ही निगम में ज्यादातर ऐसे निर्णय हुए हैं जो विवादित रहे हैं जिनको लेकर निगम से लेकर शासन तक में सवाल उठे और उनके लिए एमडी को ही जिम्मेदार माना गया। कुछ मामलों में शासन ने एमडी को फटकार लगाते हुए उनसे स्पष्टीकरण भी माँगा गया लेकिन कहीं न कहीं सारे मामले फाइलों में गुम हो गए।
यहाँ हम बात करते हैं बतौर एमडी अरविन्द कुमार सिंह के द्वारा की गयी उस अवैध नियुक्ति की, जिसे वन निगम की नियमावली के विरुद्ध विपणन अधिकारी के पद पर कर दी गयी। आपको बता दें कि वन निगम में बाबू के पद पर तैनात यूनियन के अध्यक्ष गौरव अमोली को विपणन अधिकारी के पद पर नियुक्ति दे दी गयी जो विवादों के घेरे में है। यहाँ एक बात और उल्लेखनीय है कि गौरव अमोली की छवि एक भ्रष्ट बाबू की रही है जिसने विपणन कार्यों का 12 साल का फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र निगम में दाखिल किया था जिसपर तत्कालीन विपणन अधिकारी ने संदिग्ध मानते हुए जाँच के लिए संबंधित जिम्मेदार अफसरों को पत्र लिखकर पुष्टि करने को कहा लेकिन वन निगम के भ्रष्ट तंत्र ने मामले को दबा दिया। विपणन अधिकारी के पद पर अवैध नियुक्ति पाए गौरव अमोली के खिलाफ ये कोई पहला मामला नहीं है, इससे पहले निजी उपयोग के निमित्त निगम से छूट के साथ आधे रेट पर ली गयी इमारती लकड़ी को गौरव अमोली ने लखनऊ लाकर बेंच दिया। इस प्रकरण की जाँच हो जाये तो गौरव अमोली को जेल की हवा तक खानी पड़ सकती है लेकिन यहाँ भी निगम में फैले भ्रष्टाचार के मकड़ जाल ने उसे बचा लिया।
गौरव अमोली की विपणन अधिकारी के पद पर की गयी नियुक्ति पर एमडी अरविन्द कुमार सिंह से पुछा गया -
विपणन अधिकारी गौरव अमोली के खिलाफ कई गंभीर अनियमितताओं/ भ्रष्टाचार के आरोप हैं-
1)- विपणन अधिकारी के पद पर गौरव की नियुक्ति नियम विरुद्ध है, क्या इनकी नियुक्ति निरस्त की जाएगी?
2)- गौरव अमोली द्वारा विपणन के कार्यों के अनुभव सम्बन्धी फर्जी सर्टिफिकेट लगाया है जिसकी पुष्टि/जांच के लिए तत्कालीन विपणन अधिकारी श्री सुनील जैन द्वारा पत्र लिखा गया था, क्या मामले की जांच निगम द्वारा करायी जायेगी?
3)-गौरव अमोली द्वारा निजी उपयोग के नाम रियायती दरों पर निगम से इमारती लकड़ी प्राप्त की और उसे बाजार दर पर बेंच दिया, क्या इस सम्बन्ध में निगम द्वारा नियमानुसार कोई कार्रवाई की जाएगी?
4)- क्या उपरोक्त पुष्ट आरोपों के सम्बन्ध में निगम प्रबंधन कोई ठोस कार्रवाई करेगा?
फ़िलहाल एमडी वन निगम अरविन्द सिंह से इन चार सवालों का खबर लिखे जाने तक न तो कोई स्पष्ट जवाब मिला है और न ही एमडी के स्तर से कोई कार्रवाई की गयी है।
एमडी वन निगम अरविन्द कुमार सिंह भले ही सफाई देते हुए खुद के "corrupt" न होने की बात तो कहते हैं लेकिन निगम में हो रहे फर्जीवाड़े/ लूट के लिए कौन जिम्मेदार है इसपर चुप्पी साध लेते हैं। विपणन अधिकारी के पद पर अवैध नियुक्ति की जानकारी विभागीय मंत्री डॉ अरुण कुमार सक्सेना को भी है जो वन निगम के अध्यक्ष भी हैं लेकिन उनकी तरफ से भी इस प्रकरण में कोई प्रतिक्रिया खबर लिखे जाने तक प्राप्त नहीं हुई है। आपको ये भी बता दें कि वन निगम शक्ति के केंद्र दो ही हैं जिसमें बतौर निगम अध्यक्ष डॉ अरुण कुमार सक्सेना हैं जिनके आदेश/निर्देश के बिना निगम में पत्ता तक नहीं हिलता और दूसरे हैं एमडी वन निगम अरविन्द कुमार सिंह जो निगम के मुखिया हैं जिनके दस्तखत अथवा अनुमोदन के बिना कोई आदेश जारी नहीं हो सकता।
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