Up Kiran,Digital Desk: बलूचिस्तान में जारी उग्रवाद ने पाकिस्तान की सरकार और सेना के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। हाल में हुए हमलों में बलूच विद्रोहियों ने 12 अलग-अलग स्थानों पर सुरक्षा बलों, पुलिस और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया। इस हमले में 10 सुरक्षाकर्मी अपनी जान गंवा चुके हैं, जिससे राज्य की सुरक्षा स्थिति और भी चिंताजनक हो गई है। मुख्यमंत्री सरफराज बुगती इन घटनाओं पर गहरे आक्रोश और व्यथा के साथ प्रतिक्रिया देते नजर आए।
हालांकि इस बार इन हमलों ने एक अलग तरह का ध्यान आकर्षित किया, जब बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने दो महिला हमलावरों की तस्वीरें जारी की। यह विशेष रूप से इसलिए अहम है क्योंकि लंबे समय से सशस्त्र संघर्षों में महिलाओं की भूमिका को नजरअंदाज किया जाता रहा है।
महिला उग्रवादियों की भूमिका में वृद्धि
हाल के हमलों में बीएलए ने दो महिला हमलावरों की पहचान का खुलासा किया, जिनमें से एक 24 वर्षीय आसिफा मेंगल थी। आसिफा ने जनवरी 2024 में फिदायीन हमले का निर्णय लिया और नुश्की में एक हमले को अंजाम दिया। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी इस बात की पुष्टि की कि महिला उग्रवादी इस संघर्ष का हिस्सा बन चुकी हैं।
इन घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर बीएलए से जुड़ी एक अन्य महिला लड़ाके का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वह हथियारों से लैस होकर सुरक्षा बलों के खिलाफ गतिविधियां करती नजर आई। इस तरह के वीडियो से यह संकेत मिलता है कि बलूचिस्तान में महिलाएं अब उग्रवादी संगठनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
बलूच प्रतिरोध आंदोलन में सामाजिक और रणनीतिक बदलाव
विश्लेषकों के मुताबिक, बलूच विद्रोह अब पारंपरिक जनजातीय ढांचे से बाहर निकल कर एक नए सामाजिक और राजनीतिक मोड़ पर पहुंच चुका है। यह बदलाव पाकिस्तान की सुरक्षा रणनीतियों के लिए एक नई चुनौती पेश कर रहा है। बलूचिस्तान में सख्त सरकारी कार्रवाइयां और राजनीतिक संवाद की कमी के चलते स्थानीय जनता में असंतोष गहराया है। इसके परिणामस्वरूप बलूच समाज में गुस्सा और निराशा की भावना बढ़ी है, जो अब महिलाओं को उग्रवादियों के रूप में सामने ला रही है।
राजनीतिक विश्लेषक आयशा सिद्दीका का कहना है कि जब समाज में महिलाएं विद्रोहियों के रूप में उभरती हैं, तो यह उस समाज के टूटते सामाजिक ढांचे और गहरे गुस्से का संकेत होता है।
महिलाओं की भूमिका के बढ़ने के कारण
बलूचिस्तान में महिला उग्रवादियों की भूमिका में इस वृद्धि को कई सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं से जोड़ा जा सकता है। वॉइस फॉर बलूच मिसिंग पर्सन्स के आंकड़ों के मुताबिक, 2000 के बाद से लगभग 5000 लोग लापता हो चुके हैं, जिनमें ज्यादातर पुरुष हैं। ऐसे में कई महिलाओं ने अब अपने परिवारों और समाज के खिलाफ होने वाले अत्याचारों का विरोध करने के लिए उग्रवादी संगठनों में शामिल होना शुरू किया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जैसे-जैसे बलूच आंदोलन में जनजातीय सरदारों की बजाय शिक्षित और मध्यवर्गीय नेतृत्व उभरा है, वैसे-वैसे महिलाओं की भागीदारी भी तेजी से बढ़ी है।
सुरक्षा संकट और पाकिस्तान के लिए बढ़ती चुनौती
बलूचिस्तान में उग्रवाद के बढ़ते हमलों के कारण पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा गंभीर संकट में है। 2011 के बाद से बलूच विद्रोह से जुड़े हमलों में पाकिस्तान में 350 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। अब 2024 और 2025 में संघर्ष से जुड़ी मौतों में तेज़ी आई है, जिससे पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों पर दबाव और बढ़ गया है।
सैन्य मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी के मुताबिक, महिलाओं की बढ़ती भूमिका बलूच समाज में गहरे निराशा और सामाजिक टूटन को दर्शाती है। हालांकि, पाकिस्तानी सरकार के समर्थक विश्लेषक इसे शोषण के रूप में देखते हैं, और उनका आरोप है कि उग्रवादी संगठन युवा महिलाओं को भावनात्मक और मानसिक दबाव डालकर अपने साथ जोड़ रहे हैं।
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