Up Kiran, Digital Desk: मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने देशभर में अपनी राजनीतिक ताकत को इस तरह से स्थापित किया है, जैसे पहले कभी नहीं हुआ। करीब एक दशक पहले तक यह पार्टी सिर्फ हैदराबाद तक सीमित थी, लेकिन आज यह पूरे भारत में अपनी पैठ बना चुकी है। असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व में पार्टी ने अपनी पहचान एक प्रमुख मुस्लिम राजनीतिक धारा के रूप में बनाई है, जो अब हर राज्य में अपना प्रभाव दिखा रही है। एआईएमआईएम की यह यात्रा बीजेपी के उसी मॉडल से मिलती-जुलती है, जिस तरह से बीजेपी ने 2014 के बाद से अपने आप को नए सिरे से पुनर्निर्मित किया था। हालांकि, दोनों की प्रगति की गति में अंतर है, लेकिन ओवैसी ने अपनी पार्टी को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत बना दिया है।
हैदराबाद से बाहर बढ़ता एआईएमआईएम का प्रभाव
हैदराबाद और तेलंगाना में एआईएमआईएम का असर अब पहले से कहीं अधिक दिखने लगा है। वर्तमान में, राज्य में एआईएमआईएम के पास 7 विधायक, 2 सदस्य, और दर्जनों निगम पार्षद हैं। खासकर बिहार में पार्टी ने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है, जहां 2 बार एआईएमआईएम को 5 सीटें मिली हैं। महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों में, पार्टी ने शरद पवार की एनसीपी से तीन गुना अधिक सीटें जीती हैं, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना को उससे केवल 30 सीटें ज्यादा मिलीं। यह बदलाव साबित करता है कि ओवैसी और उनकी पार्टी ने अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत किया है।
ओवैसी का बढ़ता प्रभाव और मुस्लिम वोटबैंक पर असर
असदुद्दीन ओवैसी की पहचान अब एक राष्ट्रीय मुस्लिम नेता के रूप में बन चुकी है। ओवैसी के समर्थकों की संख्या केवल युवा मुसलमानों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उनके कट्टर विरोधी भी उन्हें सुनते हैं। ओवैसी की यह ताकत उनके विचारों और उनकी पार्टी की दिशा में निहित है। जब कभी राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा होती है, तो ओवैसी अपनी बात रखने के लिए विदेश भी जाते हैं, और भारतीय मुसलमानों के मुद्दे पर उनकी आवाज भी असरदार हो चुकी है। यही वजह है कि एआईएमआईएम का प्रभाव अब केवल हैदराबाद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पूरे देश में मुस्लिम समुदाय के बीच उनकी पकड़ मजबूत होती जा रही है।
बिहार, यूपी और दिल्ली में एआईएमआईएम की बढ़त
एआईएमआईएम का प्रभाव अब सिर्फ दक्षिण भारत तक नहीं, बल्कि उत्तर और पश्चिम भारत में भी देखने को मिल रहा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में, भले ही पार्टी ने सीमित सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन उसके वोटों ने बीजेपी-विरोधी दलों के लिए चुनौती पेश की। खासतौर पर यूपी और बिहार में पार्टी के वोट बैंक ने कई सीटों पर बीजेपी की जीत को प्रभावित किया। दिल्ली में 2025 के विधानसभा चुनावों में, मुस्तफाबाद जैसे क्षेत्रों में एआईएमआईएम के कारण बीजेपी की जीत का अंतर घटा है, जिससे पार्टी की बढ़ती ताकत को महसूस किया जा सकता है।
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