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उत्तर प्रदेश वन निगम विगत कुछ महीनों से जबरदस्त चर्चा में है। इस पूरे निगम में जो कथा-कहानी चल रही है, उसके किस्से परत-दर-परत खुलते जा रहे हैं।  विभाग कुछ प्रभावशाली नटवरलाल अफसरों के चुंगल में फंस चुका है। यहां का एक नटवरलाल शिरोमणि अफसर सरकारी पैसे से तीन लाख का काजू-बादाम चाप गया, क्योंकि पैसा सरकारी है..!!!  इस 10 नंबरी अफसर के खिलाफ कुछ दिन पहले एक अखबार ने लंबी खबर छापी थी कि कैसे एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के बीबी-बेटे तक के पीछे यह पड़ा हुआ था। भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अफसर सुजॉय बनर्जी जो विगत कई वर्षों से वन निगम में तैनात हैं अपनी मनबढ़ई को लेकर विभाग में चर्चा का विषय बने हुए हैं। वन निगम में इनकी मनबढ़ई और भ्रष्टाचार की परतें खुलने लगी हैं। 

महाप्रबंधक कार्मिक के पद पर तैनाती के साथ साथ सुजॉय बनर्जी वन निगम में अन्य कई महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हैं जैसे क्षेत्रीय प्रबंधक प्रयागराज, महाप्रबंधक पूर्वी प्रयागराज, महाप्रबधक तेंदूपत्ता उत्तर प्रदेश वन निगम लखनऊ, चार चार्जों पर हैं। चूँकि साहब के पास चार महत्वपूर्ण चार्ज हैं तो चारों चार्जों से संबंधित विभागीय  सुविधाओं जैसे चार खलासी, चार गाड़ियां, चार ड्राइवर आदि  सारे लाभ जमकर उठा रहे हैं। एक चौकीदार के पद पर प्रयागराज में तैनात राम मिलन की कहानी तो हम आपको पहले ही बता चुके हैं कि सुजॉय बनर्जी ने वन निगम प्रयागराज में तैनात एक चौकीदार, उसकी बीबी और उसके बेटे के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर कैसे अपना ईगो सेटिसफाइड करता हुआ अपने पद की गरिमा खो बैठा है। चौकीदार राम मिलन को मानसिक रूप से बंधक बनाकर अपने आवास को कैंप कार्यालय दिखाकर उससे जबरन घरेलू कार्य लिया जा रहा है।

राम मिलन चौकीदार से संबंधित खबरों के प्रकाशित होते ही महाप्रबंधक कार्मिक सुजॉय बनर्जी अपना आपा खो बैठे और पत्रकार के वन निगम में आवाजाही पर वैन संबंधी एक पत्र जारी कर निगम मुख्यालय गेट पर चस्पा करवा दिया। पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो पत्रकार संगठन इसके विरोध में आये और कार्रवाई की मांग शुरू हो गयी। मामले को लेकर विभागीय मंत्री और वन निगम अध्यक्ष डॉ अरुण कुमार सक्सेना और अपर मुख्य सचिव हेक़ाली झिमोमी को पत्र  लिखकर सुजॉय बनर्जी को सस्पेंड करते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की गयी है।

महाप्रबंधक कार्मिक सुजॉय बनर्जी को लेकर वैसे तो कई कहानियां सामने आ रहीं है जो उनकी स्वेच्छाचारिता और उनके भ्रष्टाचार का सामना कराता है लेकिन आज हम आपको सुजॉय बनर्जी का एक ऐसा मामला बताते हैं जो उनके चारित्रिक व्यवहार और उनकी मानसिकता को दर्शाता है। आपको बता दें कि "श्री सुजॉय बनर्जी महाप्रबंधक (कार्मिक) प्रतिमाह सूखे मेवा लगभग 5500/- का खरीदते हैं और उसका उपयोग अपने घर में करते हैं तथा व्यय का बिल ऑफिस के भंडार रजिस्टर में प्रविष्टि कराकर सरकारी राजस्व का निजी हित में उपयोग करते हैं। विगत लगभग तीन वर्षों में यह लगभग 200,000 (दो लाख) का वन निगम के पैसे से ड्राई फ्रूट खा चुके हैं। श्री सुजॉय बनर्जी महाप्रबंधक (कार्मिक) भ्रष्टतम अधिकारी हैं  यह गिरहकटई से लेकर सरकारी धन की डकैती करने में माहिर हैं।" ये अंश शिकायती पत्र का एक हिस्सा मात्र है, शिकायत में महाप्रबंधक कार्मिक सुजॉय बनर्जी के भ्रष्टाचार की पूरी कलाई खोलकर रख दी गयी है। 

शिकायतकर्ता राजेंद्र कुमार शुक्ला ने लगभग साल भर पहले मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश सरकार को पत्र लिखा गया था जिसका संज्ञान लेते हुए  शासन ने वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी बी प्रभाकर को जाँच अधिकारी नियुक्त किया। जाँच अधिकारी बी प्रभाकर ने वन निगम प्रबंध निदेशक अरविन्द कुमार सिंह से इसकी पुष्टि भी करवा ली है। शासन द्वारा शिकायतकर्ता से इस संबंध में शपथपत्र पहले ही लिया जा चुका है।  सूत्रों की मानें तो एमडी वन निगम ने भी ड्राई फ्रूट संबंधी बात को माना है तथा शिकायत से संबंधित तथ्यों की सत्यता के संबंध में जाँच अधिकारी को अपनी आख्या प्रेषित कर दी है। शासन के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जाँच अधिकारी बी प्रभाकर की जाँच रिपोर्ट शासन को प्राप्त हो गयी है।

महाप्रबंधक कार्मिक सुजॉय बनर्जी की मनमानी से विभागीय मंत्री और वन निगम अध्यक्ष डॉ अरुण कुमार सक्सेना भलीभांति अवगत हैं। सुजॉय बनर्जी के विरुद्ध भ्रष्टाचार और मनबढ़ई कि शिकायतें मंत्री कार्यालय को प्रेषित की गयी लेकिन उन शिकायतों पर मंत्री कार्यालय कुंडली मारकर बैठ जाता है। विभागीय मंत्री डॉ सक्सेना भ्रष्टाचार की शिकायतों पर जाँच और कार्रवाई की बात तो करते हैं लेकिन मंत्री को भेजी गयी शिकायतें विभागीय भंवरजाल में फंसकर गोते लगाती हुई डूबकर दम तोड़ देती हैं।

खबर लिखे जाने तक एमडी वन निगम अरविंद कुमार सिंह से संपर्क स्थापित नहीं हो पाया यहाँ तक कि उनके ऑफिसियल मेल आईडी md@upfc.in  से भी कोई प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई।              क्रमशः 

फोटो : प्रतीकात्मक। 
 

 

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