Up Kiran, Digital Desk: मकर संक्रांति का पर्व हर वर्ष पूरे भारत में धूमधाम से मनाया जाता है, और यह दिन सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश करने का प्रतीक है। धार्मिक दृष्टिकोण से यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इस दिन से सूर्य देवता मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जो शास्त्रों में अत्यधिक महत्व रखता है। यह समय आध्यात्मिक उन्नति और पुण्य के कार्यों के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। आइए जानते हैं इस दिन का महत्व और समाज पर इसके प्रभाव के बारे में।
उत्तरायण का महत्व और शास्त्रों में इसका संदर्भ
मकर संक्रांति के दिन से सूर्य की उत्तरायण गति शुरू होती है। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन माना गया है और इसी दिन से उनके छह माह का दिन प्रारंभ होता है। यह समय शुभ कार्यों के लिए अत्यधिक उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही दान, स्नान, पूजा और तर्पण जैसे कार्य विशेष रूप से लाभकारी होते हैं।
दान और पुण्य के अवसर
इस दिन को दान और पुण्य का पर्व माना जाता है। विशेष रूप से पवित्र नदियों में स्नान करने से पापों का नाश होता है और शुभ फल की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में वर्णित है कि जब सूर्य उत्तरायण में होते हैं, तब किए गए सभी शुभ कार्यों से विशेष लाभ मिलता है। इस दिन का महत्व सिर्फ धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि समाज के लिए भी है क्योंकि यह समय लोगों को आत्मसुधार और समाज सेवा के लिए प्रेरित करता है।
गंगासागर मेला और भगीरथ की कथा
मकर संक्रांति से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा भगीरथ के प्रयासों से संबंधित है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन देवी गंगा ने भागीरथ के मार्गदर्शन में पृथ्वी पर अवतरण किया था, जिससे उनके पूर्वजों को मुक्ति प्राप्त हुई। इस दिन गंगासागर में विशाल मेला लगता है, जहां लाखों लोग गंगा स्नान करने और तर्पण देने के लिए एकत्रित होते हैं।
मकर संक्रांति और सूर्य पूजा
मकर संक्रांति के दिन सूर्य पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर लोग नदियों में स्नान करने के बाद सूर्यदेव की पूजा करते हैं। यह पूजा स्वास्थ्य, समृद्धि, और मानसिक शांति की प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण तरीका है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किए गए शुभ कार्यों से जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
गीता और महाभारत में उत्तरायण का महत्व
भगवान श्री कृष्ण ने गीता में उत्तरायण के महत्व का उल्लेख किया है। उनके अनुसार जब सूर्य उत्तरायण होते हैं, तो इस समय किए गए कार्यों का फल सकारात्मक होता है और मृत्यु के समय शरीर त्यागने से व्यक्ति को पुनर्जन्म नहीं मिलता, बल्कि वह ब्रह्म को प्राप्त करता है। महाभारत में भीष्म पितामह ने अपनी मृत्यु के समय उत्तरायण के आगमन का इंतजार किया था, ताकि उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो सके।
मकर संक्रांति से जुड़ी अन्य परंपराएं
भारत में मकर संक्रांति का पर्व विभिन्न रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। उत्तर भारत में इस दिन लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है, जो शीत ऋतु के समाप्त होने और रबी फसलों के आगमन का प्रतीक है। वहीं, अन्य क्षेत्रों में लोग पतंगबाजी, तिलगुड़, और तिल से बने व्यंजनों का आनंद लेते हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि समाज में एकता और खुशहाली का संदेश भी देता है।




