Up Kiran, Digital Desk: वर्तमान में दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां भू-राजनीतिक तनाव नई ऊंचाइयों पर पहुंच चुका है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त विदेश नीति और बयानबाजी के बीच वैश्विक स्तर पर संघर्ष के संकेत मिल रहे हैं। मध्य-पूर्व से लेकर यूरोप तक स्थिति गंभीर हो चुकी है, और युद्ध के बादल घेर रहे हैं। अमेरिकी सैन्य तैनाती, ईरान की प्रतिकारात्मक तैयारियां और डेनमार्क की दृढ़ चेतावनियों ने वैश्विक व्यापार, ऊर्जा, और अर्थव्यवस्था को भी संकट के गर्त में डाल दिया है।
अमेरिका की बढ़ती सैन्य तैनाती
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव को देखते हुए, अमेरिका ने अपनी सैन्य शक्ति को और मजबूत किया है। हाल ही में दर्जनों सैन्य विमान, जैसे कि KC-135 स्ट्रैटोटैंकर और C-17 ग्लोबमास्टर III, यूरोप से लेकर मध्य-पूर्व की ओर तैनात किए गए हैं। इन विमानों को कतर जैसे रणनीतिक ठिकानों पर तैनात करने की संभावना है, जो अमेरिका की हवाई शक्ति और लॉजिस्टिक क्षमता को और बढ़ाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ये कदम किसी अप्रत्याशित सैन्य संकट से निपटने के लिए उठाए गए हैं। हालांकि, पिछले सैन्य तैनाती के अनुभव से यह स्पष्ट है कि युद्ध की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई थी।
ईरान की तैयारियां: क्या युद्ध की संभावना है?
ईरान ने भी अपनी सुरक्षा को लेकर ऐतिहातन कदम उठाए हैं। 4 जनवरी को ईरान ने अपने प्रमुख शहरों में वायु रक्षा और मिसाइल अभ्यास किए। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने अपनी मिसाइल इकाइयों और रडार प्रणाली को सक्रिय किया, ताकि देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती मिल सके। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान दोनों के बीच एक अघोषित युद्ध का माहौल बना हुआ है, लेकिन दोनों ही पक्ष सीधी सैन्य टक्कर से बचने की कोशिश कर रहे हैं। इस स्थिति ने क्षेत्रीय सामरिक संतुलन को और नाजुक बना दिया है।
डेनमार्क की सख्त चेतावनी
इसी बीच, डेनमार्क ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को साफ चेतावनी दी है कि यदि उसने ग्रीनलैंड पर हमला किया तो डेनमार्क बिना किसी देरी के लड़ाई में उतर जाएगा। यह बयान नाटो सहयोगियों के बीच बढ़ती चिंताओं को दर्शाता है। डेनमार्क और अमेरिका दोनों नाटो के सदस्य हैं, और यदि अमेरिकी सेना डेनमार्क पर हमला करती है तो यह पूरी नाटो के खिलाफ हो सकता है, जिससे यूरोपीय देशों का समर्थन डेनमार्क को मिलेगा। इस विवाद के बढ़ने की वजह ट्रंप की आक्रामक बयानबाजी मानी जा रही है, हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह एक कूटनीतिक संकट है और युद्ध की संभावना बेहद कम है।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव की जड़ें
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव का प्रमुख कारण ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में बढ़ रहा है, जबकि ईरान इसे सिर्फ ऊर्जा जरूरतों के लिए एक शांतिपूर्ण कार्यक्रम बताता है। 2018 में ट्रंप ने अमेरिका को परमाणु समझौते (JCPOA) से बाहर कर लिया था, जिसके बाद तनाव और बढ़ गया। ईरान को यह चिंता है कि अमेरिकी सैन्य ठिकानों की तैनाती से उसकी चारों ओर घेराबंदी हो रही है, और यह उसकी सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है। इसके अलावा, इजराइल और ईरान के बीच विरोधाभास और अमेरिका का इजराइल के प्रति समर्थन भी इस तनाव को और बढ़ाता है।
ग्रीनलैंड विवाद: डेनमार्क और अमेरिका के बीच बढ़ते मतभेद
ग्रीनलैंड विवाद ने डेनमार्क और अमेरिका के बीच तनाव को नई दिशा दी है। ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है, को लेकर ट्रंप ने पहले इसे “खरीदने” का प्रस्ताव रखा था, जिसे डेनमार्क ने नकार दिया। डेनमार्क का कहना है कि यदि उनकी जमीन पर हमला हुआ तो वे तुरंत कार्रवाई करेंगे। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए था, न कि युद्ध की धमकी।
वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था पर असर
इन भू-राजनीतिक घटनाओं का असर वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। अमेरिका ने कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों से बाहर निकलने की घोषणा की है, और इससे वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता बढ़ गई है। ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500% तक टैरिफ लगाने की धमकी दी है, जिसमें भारत, चीन और ब्राजील प्रमुख हैं। इससे निवेशकों में चिंता बढ़ गई है, और वे सुरक्षित स्थानों जैसे सोना और डॉलर में निवेश करना शुरू कर रहे हैं। ऐसे में शेयर बाजार में गिरावट की संभावना बढ़ गई है, और विभिन्न देशों के लिए यह आर्थिक संकट का रूप ले सकता है।
ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल
मध्य-पूर्व, विशेष रूप से ईरान, एक प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र है। तनाव बढ़ने के साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि हो रही है, जो वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर रही है। भारत, चीन और अन्य प्रमुख आयातक देशों को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे ट्रांसपोर्टेशन और बिजली महंगी हो जाएगी। इसके अलावा, यह वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकता है, जो इस समय 'हाई रिस्क-लो कॉन्फिडेंस' मोड में है।
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