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Up kiran,Digital Desk : आम आदमी पार्टी (AAP) और उसके राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के बीच की जुबानी जंग अब एक नए और कड़वे मोड़ पर पहुंच गई है। पार्टी नेतृत्व ने न केवल चड्ढा को उपनेता पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, बल्कि उन पर 'डरपोक' होने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने नतमस्तक होने के सीधे आरोप लगाए हैं। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने चड्ढा को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जो संसद का कीमती समय देश बचाने के बजाय 'एयरपोर्ट कैंटीन में समोसे सस्ते' कराने में बर्बाद कर दे, वह देश के लिए क्या लड़ेगा?

केजरीवाल के सिपाही डरते नहीं, तुम घबरा गए हो: अनुराग ढांडा

पार्टी की ओर से जारी तीखे हमले में अनुराग ढांडा ने स्पष्ट किया कि निडरता ही 'आप' की पहली पहचान है। उन्होंने राघव चड्ढा पर निशाना साधते हुए कहा, 'गुजरात में हमारे सैकड़ों कार्यकर्ताओं को भाजपा की पुलिस ने गिरफ्तार किया, तब सांसद साहब चुप रहे। पश्चिम बंगाल में वोट का अधिकार छीना जा रहा है, तब भी वह खामोश रहे। सबसे गंभीर बात यह है कि जब मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ सदन में प्रस्ताव आया, तो चड्ढा ने उस पर हस्ताक्षर करने से साफ मना कर दिया।' पार्टी का आरोप है कि चड्ढा अब पीएम मोदी के खिलाफ बोलने से घबराते हैं और सदन से वॉकआउट के दौरान भी मोदी जी की 'हाजिरी' लगाने बैठे रहते हैं।

संसद में बोलने पर रोक? राघव चड्ढा का पलटवार

पार्टी के इन तीखे हमलों के बीच राघव चड्ढा ने भी अपनी चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा कर सीधा सवाल पूछा कि क्या आम जनता की समस्याओं—जैसे बैंक चार्ज, टोल प्लाजा और जोमैटो राइडर्स के हक की बात करना अपराध है? चड्ढा ने सनसनीखेज आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर उनके संसद में बोलने पर रोक लगाने की मांग की है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, 'मैंने जिन मुद्दों को उठाया, उससे आम आदमी का फायदा हुआ। इससे पार्टी का क्या नुकसान हो गया? कोई मेरी आवाज क्यों दबाना चाहता है?'

'मेरी खामोशी को हार न समझना': अंदरूनी कलह हुई सार्वजनिक

राघव चड्ढा ने पार्टी नेतृत्व को चेतावनी देते हुए फिर दोहराया कि उनकी खामोशी को उनकी कमजोरी न समझा जाए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जिस तरह से पार्टी ने अपने एक सबसे चमकते चेहरे पर सीधे तौर पर 'मोदी से डरने' और 'समोसे' जैसे मुद्दों पर घेरने का प्रयास किया है, उससे साफ है कि अब सुलह की गुंजाइश खत्म हो चुकी है। भाजपा और कांग्रेस भी इस कलह पर नजर गड़ाए हुए हैं, जहां विपक्षी दल इसे 'आप' की तानाशाही और आंतरिक लोकतंत्र की कमी बता रहे हैं।