दवाओं के नाम इतने मुश्किल क्यों होते हैं, अगर आपको नहीं पता है तो जानिए यहां

दवाओं के नाम इतने मुश्किल क्यों होते हैं, अगर आपको नहीं पता है तो जानिए यहां

दवा हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी है। सामान्य सिरदर्द से लेकर गंभीर बीमारियों के इलाज तक मेडिकल साइंस ने हजारों तरह की दवाएं विकसित की हैं। लेकिन जब हम किसी दवा का नाम पढ़ते या बोलने की कोशिश करते हैं तो कई बार जीभ अटक जाती है। पैरासिटामोल जैसे कुछ नाम आसानी से याद रह जाते हैं, लेकिन हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन और लेवोसेटिरिज़िन जैसे नाम आम लोगों के लिए काफी कठिन लग सकते हैं।

अक्सर लोगों के मन में सवाल आता है कि आखिर दवाओं के नाम इतने जटिल क्यों रखे जाते हैं? क्या इन्हें आसान भाषा में नहीं बनाया जा सकता? दरअसल, दवाओं के नाम केवल पहचान के लिए नहीं होते, बल्कि इनके पीछे वैज्ञानिक नियम और अंतरराष्ट्रीय मानक जुड़े होते हैं।

हर दवा के होते हैं तीन अलग-अलग नाम

किसी भी दवा को आमतौर पर तीन नामों से पहचाना जाता है। इन तीनों नामों का अपना अलग उद्देश्य होता है।

केमिकल नाम बताता है दवा की संरचना

दवा का केमिकल नाम उसके अणुओं की संरचना के आधार पर तय किया जाता है। यह नाम वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इससे दवा के रासायनिक ढांचे की जानकारी मिलती है। हालांकि यह नाम काफी लंबा और कठिन हो सकता है, इसलिए आम लोग इसे इस्तेमाल नहीं करते।

उदाहरण के तौर पर पैरासिटामोल का रासायनिक नाम N-(4-hydroxyphenyl)acetamide है, जिसे याद रखना हर किसी के लिए आसान नहीं है।

जेनेरिक नाम से होती है दुनियाभर में पहचान

दवा का जेनेरिक नाम यानी International Non-Proprietary Name (INN) उसका आधिकारिक नाम होता है। यह नाम पूरी दुनिया में एक जैसा इस्तेमाल किया जाता है।

जैसे पैरासिटामोल एक जेनेरिक नाम है, जिसे अलग-अलग कंपनियां अपने अलग-अलग ब्रांड नाम से बेच सकती हैं।

ब्रांड नाम कंपनियां तय करती हैं

जब कोई फार्मा कंपनी किसी दवा को बाजार में बेचती है तो वह उसका एक आसान नाम रखती है। इसे ब्रांड नाम कहा जाता है।

उदाहरण के तौर पर पैरासिटामोल को अलग-अलग कंपनियां Crocin, Dolo जैसे नामों से बेचती हैं।

दवाओं के जेनेरिक नाम कौन तय करता है?

दवाओं के जेनेरिक नाम मनमाने तरीके से नहीं रखे जाते। इन्हें तय करने की जिम्मेदारी विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO की विशेष विशेषज्ञ समिति की होती है।

जब कोई कंपनी नई दवा विकसित करती है तो उसे उसके नाम के लिए WHO की INN कमिटी के पास आवेदन करना पड़ता है। विशेषज्ञ समिति दवा के काम, रासायनिक गुण और उसके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए एक मानक नाम तय करती है।

दवाओं के नाम में जुड़े शब्द बताते हैं उनका काम

दवाओं के कठिन नामों में कई बार कुछ खास हिस्से जुड़े होते हैं जिन्हें स्टेम या सफिक्स कहा जाता है। ये डॉक्टरों और फार्मासिस्टों को दवा की श्रेणी समझने में मदद करते हैं।

-olol वाले नाम

इस तरह के नाम अक्सर ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने वाली दवाओं में पाए जाते हैं।

उदाहरण:
Atenolol, Metoprolol

-cillin वाले नाम

इन नामों से अक्सर एंटीबायोटिक दवाओं की पहचान होती है।

उदाहरण:
Penicillin, Amoxicillin

-mab वाले नाम

ये दवाएं अक्सर कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली बायोलॉजिकल मेडिसिन होती हैं।

उदाहरण:
Rituximab

-prazole वाले नाम

इनका संबंध आमतौर पर एसिडिटी और पेट से जुड़ी समस्याओं की दवाओं से होता है।

उदाहरण:
Omeprazole, Pantoprazole

आसान नाम रखने में क्यों होती है परेशानी?

अगर हर दवा का नाम बहुत आसान और सामान्य रखा जाए तो भ्रम की संभावना बढ़ सकती है। दुनिया में एक ही बीमारी के लिए कई दवाएं मौजूद हैं। ऐसे में मिलते-जुलते नाम होने से डॉक्टर या फार्मासिस्ट गलत दवा दे सकते हैं।

इसी कारण दवाओं के नाम तय करने में काफी सावधानी बरती जाती है। WHO की कमिटी ऐसे नामों को स्वीकार नहीं करती जो पहले से मौजूद किसी दवा के नाम से बहुत मिलते-जुलते हों।

नामों में अंतर रखना क्यों जरूरी है?

दवाओं के नामों में उच्चारण और स्पेलिंग का अंतर होना बेहद जरूरी होता है ताकि किसी तरह की गलती न हो। विशेषज्ञ यह सुनिश्चित करते हैं कि दो अलग-अलग दवाओं के नाम सुनने या पढ़ने में एक जैसे न लगें।

यही वजह है कि दवाओं के नाम भले ही आम लोगों को कठिन लगें, लेकिन डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के लिए ये नाम एक तरह की जानकारी छिपाए होते हैं। हर नाम के पीछे दवा की पहचान, उसका असर और उसकी श्रेणी से जुड़ा विज्ञान काम करता है।

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