Chanakya Niti: समाज में नहीं मिल रही इज्जत, चाणक्य के ये 5 नियम बदल देंगे आपका रुतबा
बचपन में जब कोई सिर पर लाड़ से थपकी देता था तो अपनापन लगता था, लेकिन बड़े होने पर जब कोई नीचा दिखाने या अधिकार जताने के लिए ऐसा बर्ताव करे, तो दिल पर चोट लगती है। अक्सर ऐसा होता है कि उम्र, अनुभव या पद में छोटे लोग भी बिना झिझक अपमानजनक लहजे में बात कर जाते हैं। ऐसे वक्त में इंसान सोचने लगता है कि आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है, क्या समाज में मेरी कोई कद्र नहीं है? चाणक्य नीति के मुताबिक, इसके लिए दूसरों का बुरा स्वभाव नहीं, बल्कि आपका जरूरत से ज्यादा लचीला और नरम रवैया जिम्मेदार होता है। लोग जब आपको आसानी से दबा सकने वाला मान लेते हैं, तो शोषण और उपेक्षा का सिलसिला शुरू हो जाता है। अगर आप चाहते हैं कि लोग आपका फायदा उठाना बंद करें और आपको गंभीरता से लें, तो आचार्य चाणक्य के बताए ये पांच बुनियादी बदलाव आज ही अपनी जिंदगी में लागू कर लें।
पहला नियम है जरूरत से ज्यादा सीधा और भोला बनने से बचना। चाणक्य का मशहूर नीति सूत्र है कि इंसान को न तो हद से ज्यादा कड़वा होना चाहिए और न ही बिल्कुल सीधा। जंगल में कुल्हाड़ी की पहली मार हमेशा सीधे और सरल पेड़ों पर पड़ती है, जबकि टेढ़े-मेढ़े पेड़ बेखौफ खड़े रहते हैं। इसी तरह रोजमर्रा की दुनिया में जो व्यक्ति हर किसी के सामने सिर झुका लेता है, जरूरत से ज्यादा विनम्र रहता है और कभी विरोध नहीं करता, लोग उसी को सबसे पहले निशाना बनाते हैं। दूसरों की मदद करना अच्छा गुण है, लेकिन अपनी गरिमा, मानसिक शांति और स्वाभिमान की बलि देकर की गई भलाई आपको केवल कमजोर साबित करती है।
दूसरा सूत्र है अपनी कमजोरियां, आर्थिक स्थिति और गोपनीय योजनाएं किसी के भी सामने जाहिर न करना। कोई भी इंसान आपको तभी चोट पहुंचा सकता है जब उसे आपकी दुखती रग का पता हो। आचार्य चाणक्य के अनुसार, अपने घर-परिवार के झगड़े, पैसों की तंगी, अतीत की गलतियां या भविष्य की बड़ी योजनाओं का ढिंढोरा कभी किसी के सामने न पीटें, फिर चाहे वह आपका कितना भी करीबी दोस्त क्यों न हो। वक्त बदलने पर रिश्ते बदलते देर नहीं लगती, और जिस दिन मतभेद होते हैं, वही राज आपके खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बन जाते हैं। अपनी सोच और इरादों को हमेशा गुप्त रखें।
तीसरा और सबसे जरूरी हुनर है साफ शब्दों में 'ना' कहना सीखना। जो लोग केवल दूसरों को खुश रखने के चक्कर में या रिश्ते टूटने के डर से हर बात पर सिर हिला देते हैं, समाज उनकी अहमियत कभी नहीं समझता। ऐसे लोगों को सिर्फ जरूरत के वक्त याद किया जाने वाला 'विकल्प' बनाकर रख दिया जाता है। अपने समय, ऊर्जा और सिद्धांतों की कद्र करना सीखें। जिस काम से आपका नुकसान हो रहा हो या जो आपके उसूलों के खिलाफ हो, उसके लिए बिना किसी अपराधबोध के, शांत और स्पष्ट आवाज में मना कर दें। साफ मना करने वाले इंसान की सीमाएं तय होती हैं, और लोग ऐसे व्यक्ति से हमेशा संभलकर और सम्मानपूर्वक बात करते हैं।
चौथा बदलाव है कम बोलना और अपनी तारीफ खुद करने से बचना। हर महफिल में सिर्फ अपने बारे में बातें करना या बड़बोलापन दिखाना इंसान के कद को घटा देता है। ज्यादा बोलने वाले अक्सर भावनाओं में बहकर ऐसी बातें कह जाते हैं जिनका फायदा विरोधी उठा लेते हैं। इसके उलट, जो व्यक्ति जरूरत पड़ने पर ही तोलमोल कर बोलता है, उसके हर शब्द की कीमत होती है। शांत और गंभीर व्यक्ति के अगले कदम का अंदाजा लगाना किसी के लिए आसान नहीं होता, जिससे सामने वाले के मन में स्वाभाविक आदर पैदा होता है। अपनी तारीफ शब्दों से नहीं, बल्कि अपने काम और नतीजों से होने दें।
पांचवां और आखिरी सिद्धांत है आत्मनिर्भरता बढ़ाना और अपने हुनर को लगातार तराशना। आचार्य चाणक्य स्पष्ट कहते हैं कि यह दुनिया केवल काबिलियत, ताकत और ज्ञान को नमन करती है। जब तक आप आर्थिक, मानसिक या व्यावहारिक रूप से दूसरों पर आश्रित रहेंगे, तब तक आपको वह सम्मान कभी नहीं मिल सकता जिसके आप हकदार हैं। अपने क्षेत्र के सर्वश्रेष्ठ जानकार बनें, नई स्किल्स सीखें और आर्थिक रूप से पूरी तरह मजबूत बनें। जिस व्यक्ति के पास समाज या कार्यक्षेत्र के लिए जरूरी उपयोगिता और सामर्थ्य होता है, उसे कोई चाहकर भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। अच्छाई इंसान का आभूषण जरूर है, लेकिन जब तक उसके पीछे दृढ़ता की ढाल न हो, दुनिया उसे कमजोरी मानकर कुचलने से पीछे नहीं हटती।