रूस, अमेरिका या चीन... रेस में सब छूटे पीछे, इस मुल्क ने तैयार किया था दुनिया का पहला रॉकेट
आज के दौर में जब भी दो देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंचता है, तो सबसे पहले मिसाइलों की ताकत का ही जिक्र होता है। आज रूस, अमेरिका, चीन और भारत जैसे देशों के पास ऐसी मिसाइलें हैं जो पलक झपकते ही महाद्वीपों को पार कर तबाही मचा सकती हैं। मगर क्या आपने कभी यह जानने की कोशिश की है कि इस बेहद विनाशकारी और आधुनिक तकनीक की नींव वास्तव में कब और कहां रखी गई थी? इतिहास की यह कहानी किसी रोमांचक थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है।
बर्बादी के साए में जन्मा पहला 'महाहथियार'
अगर हम समय के पहिये को पीछे घुमाएं, तो पता चलता है कि दुनिया की सबसे पहली बैलिस्टिक मिसाइल का जनक कोई और नहीं बल्कि जर्मनी था। दूसरे विश्व युद्ध के उस भयानक दौर में, जब हर देश अपनी पूरी ताकत झोंक रहा था, तब जर्मन वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक खोज निकाली जिसने भविष्य के युद्धों का चेहरा हमेशा के लिए बदल दिया।
सितंबर 1944 की बात है, जब जर्मनी ने पहली बार लंबी दूरी तक मार करने वाले एक ऐसे हथियार का परीक्षण किया जो सीधे अंतरिक्ष की दहलीज को छूकर वापस जमीन पर तबाही मचाता था। इस बेहद खतरनाक हथियार को नाम दिया गया था V-2 रॉकेट। यह इंसानी इतिहास की पहली क्रियाशील बैलिस्टिक मिसाइल थी।
किसने बनाया था इस मिसाइल को
इस बेजोड़ और जटिल तकनीक को हकीकत में बदलने वाले मास्टरमाइंड थे जर्मनी के मशहूर रॉकेट वैज्ञानिक वर्नर वॉन ब्राउन। युद्ध के दौरान उन्होंने हिटलर की सेना के लिए इस मिसाइल को बनाया था। मगर इतिहास का मोड़ देखिए, जब 1945 में जर्मनी युद्ध हार गया, तो अमेरिका ने इस जीनियस वैज्ञानिक को अपने देश बुला लिया।
बाद में वर्नर वॉन ब्राउन ने अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के लिए काम किया। उन्होंने ही उस ऐतिहासिक सैटर्न-V रॉकेट का डिजाइन तैयार किया था, जिसने अपोलो मिशन के जरिए इंसानों को पहली बार चांद की सतह पर पहुंचाया। यानी जो दिमाग कभी मिसाइल से तबाही मचा रहा था, उसी ने बाद में मानव जाति को अंतरिक्ष का रास्ता दिखाया।
समय से बहुत आगे थी V-2 की तकनीक
1940 के उस दौर में V-2 मिसाइल की ताकत की कल्पना करना भी मुश्किल था। लगभग 14 मीटर लंबी यह मिसाइल अपने साथ भारी मात्रा में बारूद ले जा सकती थी और इसकी मारक क्षमता तकरीबन 320 किलोमीटर थी।
इसकी सबसे डरावनी बात यह थी कि इसकी रफ्तार आवाज की गति से भी कई गुना ज्यादा थी। जब यह मिसाइल आसमान से गिरती थी, तो दुश्मन को संभलने या छिपने का मौका तक नहीं मिलता था। उस जमाने में दुनिया के किसी भी देश के पास ऐसा कोई डिफेंस सिस्टम नहीं था जो इस मिसाइल को हवा में ही नष्ट कर सके।
आज का हाइपरसोनिक युग
वही तकनीक जो अस्सी साल पहले शुरू हुई थी, आज अपने सबसे एडवांस दौर में पहुंच चुकी है। वर्तमान समय में भारत समेत दुनिया के कई शक्तिशाली देशों के पास न सिर्फ बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, बल्कि ऐसी क्रूज और हाइपरसोनिक मिसाइलें भी हैं जो रडार की नजर से बचकर पल भर में दुश्मन का नामोनिशान मिटा सकती हैं। मगर यह सच हमेशा दर्ज रहेगा कि इस आधुनिक सैन्य क्रांति की शुरुआत उसी V-2 रॉकेट के साथ हुई थी।