21 साल से धूल फांक रही फाइल! शहीद अकली देवी के नाम पर अब तक क्यों नहीं हुआ आरा स्टेशन

21 साल से धूल फांक रही फाइल! शहीद अकली देवी के नाम पर अब तक क्यों नहीं हुआ आरा स्टेशन

बिहार के सियासी गलियारों में इन दिनों जीवित शख्सियतों के नाम पर शहरों और स्थलों का नाम बदलने की बहस जोरों पर है, लेकिन देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते जान न्योछावर करने वाली अमर वीरांगनाओं का सम्मान राजनीतिक फाइलों में दबा पड़ा है।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजों को धूल चटाने वाली महान स्वतंत्रता सेनानी अकली देवी का नाम आज भी अपने हक के सम्मान का इंतजार कर रहा है। जिस भोजपुर की धरती पर उन्होंने फिरंगियों से लोहा लिया, उसी आरा रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर उनके नाम पर रखने का प्रस्ताव दशकों बाद भी नीतीश सरकार के कार्यकाल में जमीन पर नहीं उतर सका है।

हंसिए से 4 अंग्रेज अफसरों को किया ढेर: कौन थीं वीरांगना अकली देवी?

अकली देवी 1942 के ऐतिहासिक 'भारत छोड़ो आंदोलन' की वह अमर क्रांतिकारी थीं, जिनके अदम्य साहस की मिसाल आज भी भोजपुर के लोकगीतों और इतिहास के पन्नों में दर्ज है।

नीमा गांव की बेटी और लसाढ़ी गांव की बहू अकली देवी ने मात्र 30 वर्ष की उम्र में अपने 12 साथियों के साथ मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था। जब ब्रिटिश हुकूमत के सिपाही गांव में महिलाओं की आबरू पर हमला करने पहुंचे, तो इस निहत्थी वीरांगना ने बिना डरे घास काटने वाले हथियार (हंसिया) से अकेले ही 4 अंग्रेज सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। इस अकल्पनीय प्रतिरोध से बौखलाए अंग्रेजों ने अंधाधुंध गोलियां बरसाकर उन्हें मौके पर ही शहीद कर दिया था। बिना किसी अपनी संतान के, पूरे गांव और देश की अस्मिता के लिए प्राण न्योछावर करने वाली इस वीरांगना के नाम पर आरा स्टेशन का नामकरण न होना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।

राज्यपाल बूटा सिंह ने 2005 में दी थी हरी झंडी, गृह मंत्रालय में धूल फांक रही फाइल

आरा स्टेशन का नाम बदलने की कवायद कोई नई नहीं है। 25 जुलाई 2005 को बिहार के तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने बख्तियारपुर रेलवे स्टेशन का नाम स्वतंत्रता सेनानी शीलभद्र याजी और आरा रेलवे स्टेशन का नाम अमर शहीद अकली देवी के नाम पर करने की औपचारिक स्वीकृति दी थी।

राजभवन की सहमति के बाद बिहार के गृह विभाग ने रेल मंत्रालय को विधिवत प्रस्ताव भेजा था। रेल मंत्रालय की ओर से यह फाइल अंतिम मुहर के लिए तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल के पास भेजी गई थी, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा और राजनीतिक उदासीनता के चलते यह फाइल बीते 21 वर्षों से गृह विभाग के दफ्तरों में धूल फांक रही है।

यूपी में धड़ाधड़ बदले नाम, बिहार में ऐतिहासिक नायकों की उपेक्षा पर उठे सवाल

स्टेशनों और शहरों के नामकरण के मामले में पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश ने तेजी से फैसले लिए हैं। यूपी में इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज, फैजाबाद को अयोध्या और मुगलसराय को पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन किया गया। इसके अलावा फुरसतगंज का नाम तपेश्वरनाथ धाम, जायस का गुरु गोरखनाथ धाम, कासिमपुर हाल्ट का जायस सिटी, अकबरगंज का मां अहोरवा भवानी धाम, मिसरौली का मां कालिकन धाम और वारिसगंज हाल्ट का नाम अमर शहीद भाले सुल्तान के नाम पर रखा गया। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब देश भर में दर्जनों स्टेशनों के नाम बदले जा रहे हैं, तो बिहार में स्वतंत्रता संग्राम के असली नायकों के नाम पर फैसला लेने में इतनी हिचकिचाहट क्यों है।