जेडीयू में संजय झा-निशांत की बढ़ती भूमिका के बीच क्या कमजोर पड़ रही है ललन सिंह की पकड़?
बिहार की राजनीति और सत्ता के गलियारों से इस वक्त जनता दल यूनाइटेड (JDU) के भीतर चल रहे पावर गेम को लेकर एक बहुत बड़ी और सनसनीखेज खबर सामने आ रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जेडीयू के अंदर संगठन के भीतर समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार की बढ़ती सक्रियता व राजनीतिक भूमिका के बीच ऐसी चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं कि क्या पार्टी के कद्दावर नेता और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह (Lalan Singh) की पकड़ कमजोर पड़ रही है? हाल ही में पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव परिणामों, पार्टी के भीतर मचे घमासान और नेताओं के बीच खुलकर सामने आए बयानों ने इस आंतरिक कलह को सतह पर ला दिया है। आइए जानते हैं जेडीयू के भीतर चल रहे इस हाई-वोल्टेज पावर गेम और समीकरणों की पूरी अंदरूनी रिपोर्ट।
केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाओं और संजय झा के उभार से शुरू हुआ सियासी द्वंद्व
बिहार की सियासत पर पैनी नजर रखने वाले जानकारों का मानना है कि जेडीयू के भीतर इस अंदरूनी कलह की असली नींव केंद्र सरकार के मंत्रिपरिषद में संभावित फेरबदल या विस्तार की चर्चाओं के साथ पड़ी थी। राजनीतिक गलियारों में जब यह सुगबुगाहट तेज हुई कि पार्टी के भीतर सांगठनिक बदलाव के तहत केंद्रीय मंत्री ललन सिंह के स्थान पर राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा को केंद्र सरकार में बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है, तभी से पार्टी के भीतर दो ध्रुव बनते दिखाई देने लगे। जेडीयू के भीतर पारंपरिक रूप से मजबूत माने जाने वाले ललन सिंह के खेमे और तेजी से उभरते संजय झा के गुट के बीच वर्चस्व की यह लड़ाई धीरे-धीरे पार्टी के फैसलों और बयानों में भी झलपने लगी है।
पटना स्नातक चुनाव और अनंत सिंह प्रकरण ने खोल दी जेडीयू की अंदरूनी गुटबाजी की पोल
इस अंतर्द्वंद्व का सबसे बड़ा उदाहरण हाल ही में संपन्न हुआ पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का विधान परिषद चुनाव रहा, जहां पार्टी के भीतर चल रही रस्साकसी पूरी तरह बेपर्दा हो गई। चुनाव के दौरान बाहुबली विधायक अनंत सिंह और जेडीयू के वरिष्ठ नेता व नवनिर्वाचित एमएलसी नीरज कुमार के बीच का विवाद खुलकर सामने आ गया था। पार्टी के भीतर जब इस विवाद को सुलझाने की बात आई, तो कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने यह जिम्मेदारी केंद्रीय मंत्री ललन सिंह को सौंपी क्योंकि वह क्षेत्र उन्हीं के संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है। हालांकि, इसके बाद ललन सिंह के बयानों और चुनाव जीतने के बाद एमएलसी नीरज कुमार द्वारा ललन सिंह से आशीर्वाद लेने से दो टूक इनकार करने ने यह साबित कर दिया कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। नीरज कुमार का यह कहना कि "वे आशीर्वाद लेने नहीं जाएंगे," सीधे तौर पर शीर्ष नेतृत्व के एक बड़े ध्रुव के प्रति उनकी नाराजगी को बयां करता है।
निशांत कुमार की सक्रियता और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक दौरों से बदले समीकरण
इस पूरे घटनाक्रम के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की राजनीतिक गतिविधियों और बयानों ने भी सियासी पारा और अधिक बढ़ा दिया है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के वाराणसी समेत अन्य इलाकों में जेडीयू के कार्यक्रमों और बैठकों में संजय झा के साथ निशांत कुमार की मौजूदगी ने इस बात के साफ संकेत दे दिए हैं कि पार्टी अब भविष्य की लीडरशिप और रणनीति को लेकर एक नए पथ पर आगे बढ़ रही है। स्वास्थ्य मंत्री और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ निशांत कुमार का सांगठनिक बैठकों में शामिल होना यह बताता है कि पार्टी हाईकमान अब युवाओं और नई पीढ़ी को आगे लाने के साथ-साथ संगठन की कमान ऐसे चेहरों के हाथों में सौंप रहा है जो पार्टी की भावी दिशा तय करेंगे।
क्या वाकई कमजोर हो रही है ललन सिंह की पैठ या यह केवल एक सियासी प्रोपोगंडा है?
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग यह मानता है कि भले ही संजय झा और निशांत कुमार की सक्रियता से पार्टी का एक नया पावर सेंटर उभर रहा हो, लेकिन जमीन पर और दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में ललन सिंह का प्रभाव अभी भी कम नहीं आंका जा सकता। ललन सिंह को नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद और पुराने रणनीतिकारों में गिना जाता है। हालांकि, हालिया बयानों और अनुशासनात्मक कार्रवाइयों—जैसे अनंत सिंह और उनकी पत्नी को पार्टी से बाहर किए जाने के फैसलों में संजय झा और पार्टी अध्यक्ष उमेश कुशवाहा की भूमिका ने यह जरूर दिखा दिया है कि पार्टी अब पुराने समीकरणों से आगे बढ़कर नए संगठनात्मक अनुशासन को लागू कर रही है।
जेडीयू की आगामी समीक्षा बैठक पर टिकी हैं देश भर की निगाहें
बिहार की सियासत में जेडीयू के भीतर मची इस उथल-पुथल के बीच पार्टी ने आगामी दिनों में एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक बुलाई है, जिसमें चुनावी नतीजों और सांगठनिक रणनीतियों पर मंथन किया जाएगा। यह बैठक तय करेगी कि आने वाले दिनों में पार्टी की कमान और फैसले पूरी तरह से किस धड़े के हाथ में मजबूत होते हैं। एक तरफ जहां ललन सिंह का जमीनी और राजनीतिक कद पार्टी की पुरानी थाती है, वहीं दूसरी तरफ संजय झा की आधुनिक कार्यशैली और निशांत कुमार की भविष्य की भूमिका जेडीयू के नए राजनीतिक भविष्य की इबारत लिख रही है। आने वाला वक्त ही बताएगा कि जेडीयू का यह आंतरिक संतुलन किस करवट बैठता है।