मर्दों का गुरुर और वर्षों पुरानी धारणा टूटी: तीन बहनों ने किया पिता का अंतिम संस्कार, छोटी बेटी ने दी मुखाग्नि
रूढ़िवादिता और केवल बेटों द्वारा ही अंतिम संस्कार किए जाने की सदियों पुरानी धारणा को तोड़ते हुए तीन बहनों ने समाज के सामने एक नई और प्रेरणादायक नजीर पेश की है। पिता के निधन के बाद, समाज की दकियानूसी पाबंदियों और पुरुषों के कथित एकाधिकार को दरकिनार कर इन बेटियों ने अपने पिता के अंतिम संस्कार की सभी रस्मों को पूरी गरिमा के साथ निभाया। इस भावुक कर देने वाले दृश्य ने न सिर्फ वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं, बल्कि एक मजबूत सामाजिक संदेश भी दिया।
रूढ़िवादी सामाजिक बेड़ियों को तोड़ा
आमतौर पर हमारे समाज में यह स्थापित धारणा रही है कि पिता की अर्थी को कंधा देना और मुखाग्नि देने का अधिकार केवल बेटों या परिवार के पुरुष सदस्यों को ही होता है। लेकिन इस परिवार में कोई बेटा नहीं होने पर, इन तीन बेटियों ने अपनी जिम्मेदारी को समझा और किसी अन्य दूर के पुरुष रिश्तेदार पर निर्भर रहने के बजाय खुद आगे आने का फैसला किया। बहनों ने मिलकर पिता की अर्थी को कंधा दिया और श्मशान घाट तक की अंतिम यात्रा पूरी की।
छोटी बेटी ने पूरी की मुखाग्नि की रस्म
श्मशान घाट पर जब अंतिम विदाई का सबसे भावुक क्षण आया, तो सभी पारंपरिक बंधनों को पीछे छोड़ते हुए सबसे छोटी बेटी ने मुख्य औपचारिकताएं निभाईं। मंत्रोच्चार के बीच छोटी बेटी ने अपने हाथों में मुखाग्नि की कमान ली और पिता की चिता को अग्नि दी। इस दौरान बड़ी और मंझली बहन ने भी अन्य आवश्यक धार्मिक रस्मों को पूरा करने में अपनी बहन का साथ दिया। वहां मौजूद ग्रामीणों और समाज के प्रबुद्ध लोगों ने इन बेटियों के हौसले और पिता के प्रति उनके अगाध प्रेम की जमकर सराहना की।
समाज के लिए बनीं प्रेरणा
बेटियों द्वारा उठाया गया यह कदम उन लोगों के मुंह पर करारा तमाचा है जो आज भी वंश चलाने या अंतिम संस्कार के लिए सिर्फ बेटों की चाह रखते हैं। आज (24 जुलाई 2026) के इस दौर में भी बेटियां हर क्षेत्र में बेटों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, और इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि माता-पिता के प्रति कर्तव्य निभाने में भी वे किसी से पीछे नहीं हैं। यह भावुक वाकया अब सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसे रूढ़िवादी धारणाओं को बदलने वाली एक बड़ी शुरुआत माना जा रहा है।