गोपालगंज में बाढ़ का भयंकर तांडव: गोद में छोटी बच्ची और पल्लू से ढका चेहरा
बिहार के गोपालगंज जिले से इस समय प्रकृति के सबसे क्रूर और विनाशकारी रूप को बयां करती हुई एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान का कलेजा कांप उठेगा। हर साल की तरह इस बार भी जब उत्तर बिहार की नदियां उफान पर आईं, तो गोपालगंज के कई इलाकों में बाढ़ का पानी इस कदर तांडव मचाने लगा कि हंसते-खेलते परिवार रातों-रात बेघर होने को मजबूर हो गए। इस जलप्रलय के बीच एक ऐसी मार्मिक और दिल को झकझोर देने वाली तस्वीर कैमरे में कैद हुई है जिसमें एक मां अपनी मासूम सी दुधमुंही बच्ची को अपनी गोद में मजबूती से समेटे हुए है और समाज की विवशता तथा धूप-बारिश के थपेड़ों से बचने के लिए उसने अपना चेहरा अपने पल्लू से पूरी तरह ढक रखा है। यह तस्वीर केवल एक महिला की लाचारी का बयान नहीं है, बल्कि यह उस भीषण मानवीय त्रासदी का जीवंत दस्तावेज है जिसे हर साल बाढ़ पीड़ितों को अपनी किस्मत मानकर झेलना पड़ता है। इस विस्तृत, गहन और स्थानीय रूप से बेहद संवेदनशील आलेख में आइए गहराई से जानते हैं कि गोपालगंज में बाढ़ के इस कोहराम की असली दास्तान क्या है और कैसे विस्थापित परिवार अपना सब कुछ गंवाकर आसमान के नीचे जीने को मजबूर हैं।
गोपालगंज में उफनाई गंडक नदी का कहर: कैसे बाढ़ के पानी ने कुछ ही घंटों में तबाह कर दिया हजारों हंसते-खेलते आशियाने
बिहार के मैदानी इलाकों में जब-जब नेपाल या ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों से भारी मात्रा में पानी छोड़ा जाता है, तब-तब गंडक और गंगा जैसी नदियां अपने आक्रामक रूप में आकर आसपास के गांवों को लीलने लगती हैं। गोपालगंज जिले के निचले इलाकों और तटबंधों के करीब बसे दर्जनों गांवों में इस बार बाढ़ का पानी इतनी तेजी से दाखिल हुआ कि लोगों को संभलने या अपने घरों का सामान बचाने तक का मौका नहीं मिला। देखते ही देखते पक्के और कच्चे मकान पानी के तेज बहाव में डूब गए, खेतों में लहलहाती फसलें बर्बाद हो गईं, और लोगों के आने-जाने के एकमात्र साधन ट्रैक्टर या नावें बन गईं। प्रशासन और आपदा प्रबंधन की टीमें राहत और बचाव कार्यों में जुटी हुई हैं, लेकिन पानी का दायरा इतना व्यापक है कि हर जरूरतमंद तक फौरी राहत पहुंचाना अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।
पलायन की मजबूरी और बेबसी की वो दर्दभरी रातें: खुले आसमान के नीचे शरण लेने को मजबूर हुए हजारों बेकसूर ग्रामीण
घर का सारा सामान पानी में डूब जाने के बाद जब लोगों के पास सुरक्षित रहने के लिए कुछ नहीं बचा, तो उन्होंने अपने बच्चों, बुजुर्गों और मवेशियों को लेकर ऊंचे बांधों या सड़कों के किनारे शरण लेनी शुरू कर दी। पॉलीथीन की पन्नी से बनी छोटी-छोटी टोपियों और तंबुओं के सहारे गुजर-बसर कर रहे इन परिवारों के सामने सबसे बड़ा संकट पीने के शुद्ध पानी, बच्चों के दूध और दो वक्त की रोटी का खड़ा हो गया है। गोद में बच्ची को लिए बैठी उस मां के चेहरे की खामोशी और उसकी आंखों में तैरता भविष्य का अनिश्चित डर इस बात का गवाह है कि गरीबी और आपदा की दोहरी मार झेलने वाले इन आम इंसानों की जिंदगी कितनी संघर्षपूर्ण होती है। न तो सिर पर पक्की छत है और न ही आने वाले दिनों का कोई ठिकाना, बस बाढ़ के उतरने का इंतजार करते हुए ये लोग हर रोज जिंदगी और मौत के बीच एक अनकहा संघर्ष लड़ रहे हैं।
राजनीतिक वादों और प्रशासनिक दावों के बीच हर साल क्यों लाचार नजर आता है उत्तर बिहार का यह जलप्रलय
हर साल बाढ़ के मौसम में राजनेताओं के दौरे, राहत सामग्रियों के पैकेट बांटने की औपचारिकताएं और बाढ़ नियंत्रण के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च करने के कागजी दावे खूब सुर्खियां बटोरते हैं। लेकिन जमीन पर हकीकत यह होती है कि जैसे ही मानसून अपने उफान पर आता है, तटबंधों की कमजोरी और कमजोर प्रशासनिक तैयारियां जनता के सामने पोल खोलकर रख देती हैं। गोपालगंज के इन इलाकों में स्थायी समाधान के रूप में पक्के तटबंधों का निर्माण और कटाव रोधी कार्य समय पर न होने के कारण हर साल हजारों परिवारों को अपनी गाढ़ी कमाई से बनाए गए घरों को पानी में बहते हुए देखने की विवशता झेलनी पड़ती है। क्या बिहार के इन बाढ़ पीड़ितों को कभी ऐसा स्थायी छुटकारा मिलेगा जहाँ उन्हें हर साल मानसून आते ही अपना सब कुछ छोड़कर इस तरह दर-दर की ठोकरें न खानी पड़ें, यह एक ऐसा गंभीर सवाल है जिसका जवाब आज भी नदारद है।
मानवता की पुकार: आइए आगे आएं और गोपालगंज के इन बेसहारा बाढ़ पीड़ितों के जख्मों पर लगाएं मरहम
गोपालगंज से सामने आई उस मां और बच्ची की यह भावुक कर देने वाली तस्वीर हम सभी के अंतरात्मा को झकझोरने के लिए काफी है कि हम अपने सुखद और सुरक्षित कमरों में बैठकर इस दर्द का केवल अंदाजा ही लगा सकते हैं। आपदा के इस कठिन समय में राजनीतिक बयानबाजी से ऊपर उठकर समाज के हर वर्ग, स्वैच्छिक संगठनों और संपन्न नागरिकों को आगे आना चाहिए तथा पीड़ित परिवारों की मदद के लिए अपना हाथ बढ़ाना चाहिए। राशन, दवाइयां, कपड़े और बच्चों के लिए जरूरी सामानों का सहयोग इन विस्थापित लोगों के जीवन में थोड़ी सी राहत और उम्मीद की किरण जगा सकता है। आइए इस मानवीय संकट की घड़ी में गोपालगंज के अपने भाइयों और बहनों के साथ खड़े हों और यह सुनिश्चित करें कि इस जलप्रलय के आगोश में कोई भी भूखा या असहाय न रहने पाए।