राजद का हाल बसपा जैसा न हो जाए! छात्र आंदोलन के बीच तेजस्वी यादव की गैर-मौजूदगी से पार्टी असहाय
बिहार की राजनीति इस वक्त एक बेहद संवेदनशील और उथल-पुथल भरे दौर से गुजर रही है। राज्यभर में छात्र संगठनों के उग्र प्रदर्शन, पेपर लीक और पुलिसिया लाठीचार्ज के विरोध में आहूत 'बिहार बंद' ने प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र को झकझोर कर रख दिया है। राजधानी पटना से लेकर जहानाबाद और अन्य जिलों तक सड़कों पर युवाओं का जनसैलाब उमड़ा हुआ है। ऐसे वक्त में, जब मुख्य विपक्षी दल को सड़कों पर उतरकर जनआंदोलन की अगुवाई करनी चाहिए थी, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के मुख्य चेहरे और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की अनुपस्थिति ने पार्टी के भीतर और बाहर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि आरजेडी का शीर्ष नेतृत्व इसी तरह जमीनी संघर्ष के वक्त नदारद रहा, तो पार्टी का हस्र भी उत्तर प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी (BSP) जैसा हो सकता है, जो कैडर और मजबूत सामाजिक आधार होने के बावजूद वक्त पर सड़क की लड़ाई लड़ने से पीछे हटने के कारण कमजोर होती चली गई।
सड़कों पर उबड़ता युवा आक्रोश और विपक्ष की खामोशी
हालिया दिनों में नीट (NEET) और अन्य परीक्षाओं के मुद्दों पर छात्रों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। पटना के डाकबंगला चौराहे से लेकर विभिन्न जिलों में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस के लाठीचार्ज और वाटर कैनन के इस्तेमाल के बाद माहौल पूरी तरह गरम है।
-
नेतृत्व का शून्य: छात्र जब सत्ता के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ रहे हैं, तब मुख्य विपक्षी दल के रूप में आरजेडी को जिस आक्रामक तरीके से सड़क पर होना चाहिए था, वैसा जमीनी समन्वय दिखाई नहीं दे रहा है।
-
असमंजस में कैडर: पार्टी का स्थानीय कैडर और युवा इकाई इस बात को लेकर असमंजस में है कि ऐसे बड़े जन-मुद्दों पर शीर्ष स्तर से स्पष्ट और मुखर आक्रामकता क्यों गायब है।
क्या आरजेडी के सामने आ रहा है 'बसपा मॉडल' वाला संकट?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसी भी क्षेत्रीय दल की ताकत उसका कैडर आधारित संघर्ष और जनता के बीच उसकी सीधी मौजूदगी होती है।
-
कमजोर होती जमीनी पकड़: जिस तरह मायावती की अगुवाई में बसपा ने समय के साथ जमीनी आंदोलनों से दूरी बना ली और केवल चुनावी समीकरणों पर निर्भर हो गई, ठीक उसी प्रकार आरजेडी पर भी यह आरोप लगने लगे हैं कि वह एयर-कंडीशन कमरों या सोशल मीडिया बयानों तक सिमट कर रह गई है।
-
वैकल्पिक ताकतों के लिए जगह: यदि मुख्य विपक्ष जनता के दर्द और छात्र आक्रोश के समय सड़क पर संघर्ष करता नहीं दिखेगा, तो वैक्यूम (शून्यता) को भरने के लिए अन्य नई राजनीतिक ताकतें या स्वतंत्र छात्र संगठन जगह बना लेंगे, जो भविष्य में आरजेडी के पारंपरिक वोट बैंक और राजनीतिक जमीन दोनों के लिए घातक साबित हो सकता है।
माय-बाप समीकरण और नेतृत्व की कसौटी
आरजेडी लंबे समय से अपने 'A-Z' और पारंपरिक 'M-Y' (মুসলিম-यादव) समीकरण के सहारे बिहार की मुख्य धुरी बनी हुई है। लेकिन आज का युवा वोटर चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग से हो, रोजगार, शिक्षा और सिस्टम के भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर है। वह ऐसे नेतृत्व की तलाश में है जो सिर्फ बयानों तक सीमित न रहे बल्कि संघर्ष के मैदान में उनके साथ खड़ा दिखे।
यदि तेजस्वी यादव और पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस निर्णायक समय में अपनी राजनीतिक सक्रियता और आक्रामक जमीन तैयार नहीं करता है, तो आने वाले दिनों में पार्टी के लिए अपनी मुख्य विपक्षी वाली हैसियत को बचाए रखना भी एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।