राजद के लगातार तीन बड़े राजनीतिक झटकों से सन्न रह गया कांग्रेस का खेमा
बिहार की राजनीति हमेशा से अपनी अप्रत्याशित चालों, उठापटक और रणनीतिक दांव-पेंच के लिए जानी जाती है, जहां कब कौन सा समीकरण बदल जाए, इसका अंदाजा लगाना बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी आसान नहीं होता है। राज्य के मुख्य विपक्षी महागठबंधन (Mahagathbandhan) के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है, और इसका सबसे बड़ा उदाहरण हाल ही में देखने को मिला है जब राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने अपने मुख्य सहयोगी दल यानी कांग्रेस पार्टी को एक के बाद एक लगातार तीन बड़े सियासी झटके दिए हैं। चाहे वह सीटों के बंटवारे का मामला हो, स्थानीय स्तर पर नेतृत्व दिखाने की बात हो या फिर क्षेत्रीय चुनावों में अपने उम्मीदवारों को एकतरफा तौर पर मैदान में उतारने का फैसला हो, राजद ने हर कदम पर अपने बड़े भाई होने का पूरा अहसास कराते हुए कांग्रेस को हाशिए पर धकेलने का काम किया है। इन तमाम रणनीतिक झटकों के बावजूद हैरानी की बात यह है कि दिल्ली से लेकर पटना तक के कांग्रेस आलाकमान और प्रदेश नेतृत्व की तरफ से उस स्तर की आक्रामक प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली है, जिसकी उम्मीद ऐसे हालात में की जा रही थी। इस गहरी और रहस्यमयी चुप्पी ने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है और हर कोई यह जानने को बेताब है कि आखिर कांग्रेस पार्टी इस अपमानजनक और असहज स्थिति में भी खुलकर विरोध क्यों नहीं कर पा रही है।
क्या हैं वे तीन बड़े झटके जिन्होंने कांग्रेस को अंदर से कमजोर कर दिया है और राजद ने कैसे साधी अपनी सियासी चाल?
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, राजद द्वारा कांग्रेस को दिए गए इन झटकों की शुरुआत तब हुई जब आगामी रणनीतिक रणनीतियों और क्षेत्रीय चुनावों में सीटों के तालमेल को लेकर कांग्रेस की आपत्तियों को दरकिनार कर दिया गया। दूसरा बड़ा झटका तब लगा जब राजद ने कांग्रेस के पारंपरिक गढ़ माने जाने वाले क्षेत्रों में भी अपने उम्मीदवारों की घोषणा करके या अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके कांग्रेस के स्थानीय कैडर को बैकफुट पर धकेल दिया, जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बुरी तरह प्रभावित हुआ। और तीसरा तथा सबसे बड़ा झटका नेतृत्व और गठबंधन के भीतर फैसलों को लेकर था, जहाँ राजद ने स्पष्ट कर दिया कि बिहार के भीतर उनकी शर्तें ही सर्वोपरि रहेंगी और गठबंधन का चेहरा या दिशा तय करने में उनकी मर्जी ही अंतिम होगी। इन तीनों लगातार आघातों के बाद भी कांग्रेस के भीतर किसी भी प्रकार की बगावत या खुलकर विरोध के सुर न फूटना इस बात का संकेत है कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व फिलहाल किसी भी कीमत पर महागठबंधन को टूटने देने का जोखिम नहीं उठाना चाहता है।
कांग्रेस की इस रणनीतिक चुप्पी के पीछे छिपी है बड़ी मजबूरी या फिर कोई सोची-समझी राष्ट्रीय रणनीति?
जब भी किसी राजनीतिक दल को उसके अपने ही गठबंधन के साथी द्वारा इस तरह लगातार किनारे किया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि पार्टी नेतृत्व चुप क्यों बैठा है। कांग्रेस पार्टी के भीतर और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इस बात पर लंबी चर्चा चल रही है कि क्या यह चुप्पी किसी बड़ी राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा है या फिर पार्टी की लाचारी को दर्शाती है। एक तरफ जहां कुछ जानकारों का मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के खिलाफ विपक्षी एकता को बचाए रखने के लिए कांग्रेस छोटे राज्यों और क्षेत्रीय दलों के दबाव को फिलहाल सहन करने की मजबूरी में है, वहीं दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस बिहार में अपनी खोई हुई जमीन को दोबारा तलाशने के लिए एक लंबे अरसे की योजना पर काम कर रही है। यदि कांग्रेस इस वक्त राजद से पंगा लेती है, तो उसे राज्य में पूरी तरह से राजनीतिक वनवास का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि वर्तमान जमीनी हालात में राजद का कैडर बेस कांग्रेस की तुलना में अधिक मजबूत और आक्रामक माना जाता है। यही कारण है कि कांग्रेस नेतृत्व ने फिलहाल 'देखो और इंतजार करो' की नीति अपनाई है और वे समय आने पर उचित राजनीतिक मोलभाव करने की फिराक में हैं।
महागठबंधन का भविष्य और कार्यकर्ताओं में निराशा: क्या इस खामोशी से संभल पाएगी कांग्रेस या होगा बड़ा नुकसान?
राजद और कांग्रेस के बीच चल रहे इस अंदरूनी शीत युद्ध और कांग्रेस की इस लंबी चुप्पी का सबसे बुरा असर जमीनी स्तर पर काम करने वाले उन कार्यकर्ताओं पर पड़ रहा है जो दिन-रात पार्टी को मजबूत करने के लिए पसीना बहाते हैं। कार्यकर्ताओं का यह मानना है कि यदि पार्टी नेतृत्व इसी तरह क्षेत्रीय दलों के सामने झुकता रहा और अपनी राजनीतिक जमीन बचाता नहीं दिखा, तो पार्टी का अस्तित्व पूरी तरह खतरे में पड़ जाएगा। विपक्षी एकता के नाम पर हर बात पर समझौता कर लेना हमेशा के लिए फायदेमंद साबित हो, यह जरूरी नहीं है, क्योंकि इससे पार्टी का जनाधार लगातार सिकुड़ता जाता है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस आलाकमान अपनी इस खामोशी को तोड़कर राजद के सामने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा पाता है या फिर आने वाले चुनावों में इसका खामियाजा उसे बड़े राजनीतिक नुकसान के रूप में भुगतना पड़ेगा। अंततः, बिहार की सियासत का यह दौर यह सिखाता है कि गठबंधन की राजनीति में समझौते और वर्चस्व की लड़ाई कभी खत्म नहीं होती, और जो दल इस संतुलन को साध लेता है, वही असली खिलाड़ी साबित होता है।