बिहार के गांवों से उठी जीविका की खामोश और शक्तिशाली क्रांति

बिहार के गांवों से उठी जीविका की खामोश और शक्तिशाली क्रांति

भारत के सबसे अधिक आबादी वाले और कृषि प्रधान राज्यों में शुमार बिहार के ग्रामीण अंचलों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान एक ऐसी खामोश और अद्भुत क्रांति ने जन्म लिया है, जिसने देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों और वित्तीय संस्थानों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। पारंपरिक रूप से गरीबी और पिछड़ेपन के कुचक्र में फंसे रहने वाले गांवों की तस्वीर अब तेजी से बदल रही है, और इस बदलाव के केंद्र में बैठी हैं हमारे समाज की वे महिलाएं जिन्हें औपचारिक शिक्षा या बड़े-बड़े स्कूलों की डिग्रियां भले ही नसीब न हुई हों, लेकिन जिनके पास जीवन का ऐसा व्यावहारिक ज्ञान और वित्तीय प्रबंधन का हुनर है, जिसे देखकर दुनिया के दिग्गज इकोनॉमिस्ट भी दंग रह गए हैं। 'जीविका' (Jeevika) नाम से चलाई जा रही इस ग्रामीण आजीविका परियोजना ने राज्य की लाखों महिलाओं के जीवन में जो रोशनी फैलाई है, वह आज वैश्विक स्तर पर एक केस स्टडी बन चुकी है।

जब अनपढ़ महिलाओं के बचत कौशल ने विश्व बैंक के दिग्गजों को हैरान किया

कुछ समय पहले जब विश्व बैंक (World Bank) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से जुड़े बड़े वित्तीय विशेषज्ञों तथा देश-विदेश के जाने-माने अर्थशास्त्रियों की टीमें बिहार के दूरदराज के गांवों का दौरा करने पहुंचीं, तो उनका मुख्य उद्देश्य यह देखना था कि जमीनी स्तर पर सरकारी और गैर-सरकारी योजनाएं कितना असर दिखा रही हैं। इन दौरों के दौरान जब विदेशी विशेषज्ञों ने ग्रामीण महिलाओं के छोटे-छोटे स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की कार्यप्रणाली का बारीकी से अध्ययन किया, तो वे यह देखकर हक्के-बक्के रह गए कि बिना किसी महंगी एमबीए की डिग्री या आधुनिक अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर के, ये महिलाएं पाई-पाई का हिसाब कितनी खूबसूरती से रखती हैं। एक-एक पैसे की बचत करना, समय पर ऋण चुकाना, आपसीसहमति से पैसों का लेन-देन करना और सबसे बड़ी बात यह कि आपातकाल के समय के लिए एक सुरक्षित फंड तैयार रखना—इनका यह कौशल किसी भी बड़े कॉर्पोरेट वित्तीय प्रबंधक को मात देने वाला साबित हुआ।

जीविका समूहों के जरिए आर्थिक स्वावलंबन और सामाजिक बदलाव की राह

बिहार में जीविका दीदियों का यह नेटवर्क आज केवल पैसों की लेन-देन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्रामीण महिलाओं की सामाजिक और राजनीतिक चेतना का भी एक बहुत बड़ा माध्यम बन चुका है। शुरुआत में जब इन समूहों का गठन किया गया था, तो रूढ़िवादी सामाजिक ताने-बाने के कारण महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलकर किसी संगठन से जुड़ना आसान नहीं था। लेकिन धीरे-धीरे जब महिलाओं ने अपने पतियों और परिवार के पुरुषों को यह दिखाया कि वे किस तरह छोटे-छोटे लोन लेकर पशुपालन, सिलाई, किराना दुकान या खेती-किसानी के कार्यों से अच्छी खासी आमदनी बढ़ा सकती हैं, तो पूरा परिदृश्य बदल गया। आज बिहार के लगभग हर गांव में जीविका समूह एक ढाल बनकर खड़े हैं, जो न सिर्फ गरीब परिवारों को साहूकारों के चंगुल से मुक्ति दिला रहे हैं, बल्कि उनके बच्चों की बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य का खर्च उठाने में भी पूरी तरह सक्षम हो चुके हैं।

पारंपरिक ज्ञान बनाम आधुनिक अर्थशास्त्र: देसी प्रबंधन का अनोखा कमाल

अर्थशास्त्र की किताबों में जोखिम प्रबंधन (Risk Management) और पूंजी निवेश (Capital Investment) के बड़े-बड़े सिद्धांत पढ़ाए जाते हैं, लेकिन बिहार की इन अनपढ़ महिलाओं ने अपने व्यावहारिक अनुभव से यह साबित कर दिया है कि असल जिंदगी का अर्थशास्त्र किताबों से कहीं ज्यादा जमीन पर काम करने से समझ आता है। उनके पास न तो कोई बैंक बैलेंस की बड़ी पासबुक हुआ करती थी और न ही बड़े वित्तीय सलाहकार, लेकिन आपसी भरोसे और अनुशासन के दम पर उन्होंने एक ऐसा स्वदेशी बैंकिंग मॉडल खड़ा कर दिया जिसका एनपीए (Non-Performing Assets) बड़े-बड़े कमर्शियल बैंकों की तुलना में नगण्य यानी शून्य के करीब है। विश्व बैंक के विशेषज्ञों ने जब इस बात का विश्लेषण किया कि कैसे बेहद सीमित संसाधनों में ये महिलाएं अपने परिवार की अर्थव्यवस्था को संभालती हैं और संकट के समय एक-दूसरे की मदद करती हैं, तो उन्होंने मुक्तकंठ से इसकी प्रशंसा की और इसे दुनिया के सबसे बेहतरीन सामुदायिक विकास मॉडलों में से एक करार दिया।

बिहार के भविष्य की सुनहरी तस्वीर और महिलाओं की अजेय इच्छाशक्ति

आज जब हम बिहार के विकास और आर्थिकी की बात करते हैं, तो यह कहना बिल्कुल भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राज्य की असली ताकत अब यहां की महिलाएं बन चुकी हैं। जीविका की इस खामोश क्रांति ने यह बता दिया है कि यदि महिलाओं को थोड़ा सा अवसर, सही मार्गदर्शन औरसमानता का मंच मिल जाए, तो वे विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी सफलता की नई इबारत लिख सकती हैं। विश्व बैंक और अर्थशास्त्रियों की यह हैरानी इस बात का प्रमाण है कि विकास की परिभाषा केवल बड़ी-बड़ी इमारतों और फैक्ट्रियों से तय नहीं होती, बल्कि जब समाज की सबसे अंतिम पंक्ति में खड़ी महिला सशक्त होती है, तो पूरा देश मजबूत होता है। आने वाले समय में यह मॉडल देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक प्रेरणास्रोत बन चुका है और यह इस बात का प्रतीक है कि बिहार अब बदलाव की एक नई और तेज़ राह पर पूरी मजबूती से आगे बढ़ रहा है।