डिजिटल भुगतान की आंधी और देश के छोटे-बड़े बाजारों की बदलती हुई तस्वीर
भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल क्रांति (Digital Revolution) के क्षेत्र में जो ऐतिहासिक छलांग लगाई है, उसने दुनिया भर के देशों को अचंभित कर दिया है। आज देश के छोटे से छोटे चाय के टप्पर से लेकर बड़े-बड़े मॉल और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स तक, हर जगह कैश (Cash) के बजाय यूपीआई (UPI) और क्यूआर कोड (QR Code) के माध्यम से भुगतान करना लोगों की रोजमर्रा की आदत बन चुका है। सेकंडों में होने वाले इन डिजिटल लेन-देन ने कारोबार को बेहद आसान और पारदर्शी बना दिया है। लेकिन इसी बीच, हाल ही में सोशल मीडिया और व्यापारिक संगठनों के बीच 'नो UPI डे' (No UPI Day) मनाए जाने की खबरों ने अचानक बाजार की फिजा को गरमा दिया था। इस सांकेतिक विरोध का उद्देश्य डिजिटल भुगतान पर लगने वाले संभावित शुल्कों या नियमों के खिलाफ आवाज उठाना था, लेकिन जब जमीनी स्तर पर बाजारों की वास्तविक स्थिति को देखा गया, तो तस्वीर कुछ और ही बयां कर रही थी।
बाजारों में नहीं दिखा 'No UPI Day' का कोई असर, ग्राहकों और दुकानदारों ने जारी रखा डिजिटल लेन-देन
जब व्यापारी संगठनों द्वारा 'नो यूपीआई डे' के आह्वान की चर्चा जोरों पर थी, तो यह कयास लगाए जा रहे थे कि शायद उस दिन बाजारों में अचानक सन्नाटा छा जाएगा और लोग फिर से पुराने कागजी नोटों की तरफ लौट आएंगे। लेकिन जब रिपोर्टर ने जमीनी स्तर पर जाकर उत्तर प्रदेश और देश के अन्य प्रमुख बाजारों का जायजा लिया, तो यह पाया कि इस आह्वान का बाजारों पर रत्तीभर भी असर नहीं दिखा। किराना स्टोरों, सब्जी मंडियों, कपड़ों की दुकानों और रेस्तरां में ग्राहक हमेशा की तरह अपने स्मार्टफोन से स्कैन करके धड़ल्ले से ऑनलाइन पेमेंट करते नजर आए। दुकानदारों का कहना था कि आज के वक्त में ग्राहक जेब में कैश लेकर चलना ही नहीं चाहता, ऐसे में अगर वे डिजिटल पेमेंट लेना बंद कर देंगे, तो उनका रोजमर्रा का व्यापार ठप हो जाएगा। आम जनता और दुकानदारों की इस व्यावहारिक जरूरत ने उस दिन इस विरोध के आह्वान को पूरी तरह से बेअसर साबित कर दिया।
दुकानदारों ने एकसाथ खड़े होकर डिजिटल पेमेंट से जुड़े नए नियमों को वापस लेने की उठाई मांग
भले ही बाजार में लेन-देन सामान्य रूप से चल रहा हो, लेकिन देश भर के व्यापारियों और दुकानदारों के मन में डिजिटल पेमेंट सिस्टम को लेकर गहरी चिंताएं और असंतोष जरूर सुलग रहा है। व्यापारी संघों और एसोसिएशनों ने एक मंच पर एकसाथ खड़े होकर यह मांग उठाई है कि सरकार और फिनटेक कंपनियों को ऐसे किसी भी नियम को लागू नहीं करना चाहिए जिससे छोटे व्यापारियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़े। दुकानदारों का मुख्य विरोध इस बात को लेकर है कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) या अन्य किसी भी रूप में डिजिटल ट्रांजैक्शन पर यदि अतिरिक्त शुल्क थोपा गया, तो इससे छोटे दुकानदारों का मुनाफा पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। व्यापारियों ने दो टूक शब्दों में यह चेतावनी दी है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना अच्छी बात है, लेकिन इसकी कीमत छोटे और मध्यम वर्गीय दुकानदारों की कमर तोड़कर नहीं वसूली जानी चाहिए।
छोटे व्यापारियों और फिनटेक कंपनियों के बीच संतुलन बनाने की सख्त जरूरत
भारत में डिजिटल भुगतान की इस अपार सफलता के पीछे देश का वह छोटा दुकानदार और रेहड़ी-पटरी वाला है जिसने ग्राहकों को यूपीआई की सुविधा देकर इस क्रांति को घर-घर तक पहुँचाया है। यदि इन्हीं रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले दुकानदारों पर भारी-भरकम शुल्क या जटिल अनुपालन का बोझ लाद दिया जाएगा, तो वे धीरे-धीरे इस डिजिटल व्यवस्था से दूरी बनाने पर मजबूर हो सकते हैं। आर्थिक विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं का यह मानना है कि सरकार, रिजर्व बैंक और पेमेंट गेटवे कंपनियों को मिलकर एक ऐसा मध्यम मार्ग निकालना चाहिए जिसमें ग्राहकों को भी सुविधा मिले और दुकानदारों को भी किसी प्रकार का आर्थिक नुकसान न उठाना पड़े। जब तक सभी हितधारकों के हितों की रक्षा नहीं की जाती, तब तक इस तरह के विरोध प्रदर्शन और असंतोष की आवाजें समय-समय पर बाजारों में गूंजती रहेंगी।
डिजिटल भारत की इस रफ्तार को बनाए रखने के लिए संवाद ही एकमात्र उपाय
'नो UPI डे' के इस प्रकरण ने यह साबित कर दिया है कि आज डिजिटल भुगतान हमारी अर्थव्यवस्था की नस-नस में समा चुका है, और चाहकर भी इसे रातों-रात पीछे नहीं खींचा जा सकता। हालांकि, व्यापारियों की यह जायज मांग कि उनके कारोबार पर कोई अतिरिक्त वित्तीय संकट न आए, पूरी तरह से विचारणीय है। सरकार और संबंधित प्राधिकरणों को चाहिए कि वे व्यापारी संघों के साथ बैठकर खुली चर्चा करें और उनकी चिंताओं का एक संतोषजनक समाधान निकालें। देश का बाजार तभी पूरी तरह से सुरक्षित और खुशहाल रह सकता है जब तकनीक की यह गाड़ी आधुनिकता के साथ-साथ हर छोटे-बड़े व्यापारी के हितों का भी पूरा ख्याल रखे।