2032 तक अमेरिका में खाने-पीने की चीजों के बराबर पहुंच जाएगा AI का खर्च

2032 तक अमेरिका में खाने-पीने की चीजों के बराबर पहुंच जाएगा AI का खर्च

आधुनिक तकनीक और भविष्य की अर्थव्यवस्था को लेकर दुनिया भर से एक बेहद चौंकाने वाली और क्रांतिकारी रिपोर्ट सामने आ रही है। तकनीक की दुनिया में भूचाल लाने वाले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई (AI) का क्रेज और इसका आर्थिक दायरा आने वाले कुछ सालों में किस हद तक फैलने वाला है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आने वाले समय में इसका खर्च हमारी रोजमर्रा की सबसे बुनियादी जरूरत यानी खाने-पीने की चीजों को टक्कर देने वाला है। आर्थिक विश्लेषकों और वैश्विक वित्तीय शोध संस्थाओं के ताजा अनुमानों के मुताबिक, साल 2032 तक अकेले अमेरिका में एआई पर होने वाला कुल खर्च या इसकी कमाई का आंकड़ा सालाना 3.5 ट्रिलियन डॉलर (करीब 35 लाख करोड़ डॉलर) के जादुई आंकड़े को छू सकता है। यह हैरान करने वाली रकम अमेरिका में हर साल खाने-पीने की वस्तुओं पर खर्च होने वाले कुल बजट के लगभग बराबर होगी, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि भविष्य की दुनिया पूरी तरह से एआई के इर्द-गिर्द घूमने वाली है।

आखिर कैसे इतनी तेजी से बढ़ रहा है AI का बाजार और क्या हैं इस बेजोड़ आर्थिक उछाल के मुख्य कारण?

कुछ साल पहले तक जिस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को केवल चैटबॉट्स या शुरुआती सॉफ्टवेयर प्रयोगों तक सीमित माना जाता था, उसने आज दुनिया के हर बड़े उद्योग, डेटा सेंटर, स्वास्थ्य सेवा, ऑटोमोबाइल और रक्षा क्षेत्र में अपनी जड़ें बेहद मजबूत कर ली हैं। टेक कंपनियों द्वारा एआई चिप्स, उन्नत सर्वर, भारी मात्रा में ऊर्जा खपत करने वाले डेटा सेंटर्स और बड़े पैमाने पर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में अरबों-खरबों डॉलर का निवेश किया जा रहा है। दुनिया की दिग्गज तकनीक कंपनियां जैसे माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, ऐपल, मेटा और एनवीडिया इस रेस में सबसे आगे निकलने के लिए दिन-रात जुटी हुई हैं। हर क्षेत्र के बिजनेस अब अपनी उत्पादकता बढ़ाने और मैन्युफैक्चरिंग को ऑटोमेट करने के लिए बड़े पैमाने पर एआई टूल्स को अपना रहे हैं, जिसके कारण इस तकनीक की मांग में दिन-प्रतिदिन बेतहाशा बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है और इसका ग्लोबल मार्केट रॉकेट की रफ्तार से ऊपर भाग रहा है।

ग्रॉसरी और फूड मार्केट को टक्कर देता AI इंफ्रास्ट्रक्चर: भविष्य की अर्थव्यवस्था का नया पावरहाउस

यह तुलना अपने आप में बहुत कुछ कहती है कि किसी देश की जनता जितना पैसा अपने पेट भरने और खाने-पीने के सामान पर खर्च करती है, लगभग उतना ही भारी-भरकम फंड अब केवल एक वर्चुअल तकनीक और उसके बुनियादी ढांचे को खड़ा करने में खर्च होने जा रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले दशक में एआई केवल एक गैजेट या मनोरंजन का साधन नहीं रहेगा, बल्कि यह ग्लोबल जीडीपी (GDP) और वैश्विक अर्थव्यवस्था की धुरी बन जाएगा। हालांकि, इस भारी-भरकम खर्च के साथ-साथ विशेषज्ञों द्वारा बिजली की खपत, डेटा सुरक्षा और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं, क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर चलने वाले एआई डेटा सेंटर्स को चलाने के लिए огром मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

वैश्विक राजनीति और टेक वर्चस्व की लड़ाई पर क्या होगा इसका दूरगामी असर?

अमेरिका जैसे विकसित देश में एआई पर होने वाले इस 3.5 ट्रिलियन डॉलर के वार्षिक खर्च से यह भी साफ हो जाता है कि दुनिया की महाशक्तियां तकनीकी आधिपत्य स्थापित करने के लिए कितनी बड़ी आर्थिक जंग लड़ रही हैं। जो देश या कंपनियां एआई के इस बुनियादी ढांचे पर जितना अधिक निवेश करेंगी, भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उनका उतना ही मजबूत नियंत्रण होगा। भारत और अन्य उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं भी इस तकनीकी क्रांति का हिस्सा बनने के लिए तेजी से अपने कदम बढ़ा रही हैं। बहरहाल, साल 2032 तक का यह सफर यह तय करेगा कि मानव सभ्यता तकनीक के साथ तालमेल बिठाकर किस नए और अद्भुत स्वर्णिम युग में प्रवेश करती है, जहां एआई हमारी जिंदगी का सबसे अनिवार्य हिस्सा बन चुका होगा।