हवाई सफर होगा महंगा, जेट फ्यूल के दामों में 6.28 रुपये प्रति लीटर का बड़ा उछाल

हवाई सफर होगा महंगा, जेट फ्यूल के दामों में 6.28 रुपये प्रति लीटर का बड़ा उछाल

देश भर में हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों की जेब पर सीधा असर पड़ सकता है। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने विमानन टरबाइन ईंधन (एटीएफ) की दरों में ₹6.28 प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी है। इस ताजा बदलाव के बाद घरेलू एयरलाइनों के लिए जेट फ्यूल की कीमत ₹115.00 प्रति लीटर से सीधे बढ़कर ₹121.28 प्रति लीटर पर पहुंच गई है, जो कुल 5.46 प्रतिशत की शुद्ध वृद्धि है।

लगातार दूसरे महीने लगा झटका, क्या हैं ताजा दरें?

इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL) से प्राप्त आधिकारिक विवरण के अनुसार, घरेलू एयरलाइंस के लिए एटीएफ में यह लगातार दूसरे महीने हुई वृद्धि है। इससे पूर्व 1 अगस्त 2026 को भी जेट फ्यूल की दरों में ₹5 प्रति लीटर का इजाफा किया गया था, जबकि जुलाई में ₹5 प्रति लीटर की राहत दी गई थी। वर्ष 2026 की शुरुआत से मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) में गहराए भू-राजनीतिक तनाव और संघर्ष के चलते वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बनी हुई है, जिसका सीधा असर अब घरेलू विमानन ईंधन की लागत पर दिख रहा है।

हवाई किराए पर कितना पड़ेगा असर?

भारत में संचालित होने वाली किसी भी एयरलाइन के कुल परिचालन व्यय (Operational Cost) का लगभग 35 से 40 प्रतिशत हिस्सा अकेले जेट फ्यूल पर खर्च होता है। ऐसे में एटीएफ के दामों में तेज उछाल एयरलाइन कंपनियों की लागत को सीधे बढ़ा देता है। जानकार मान रहे हैं कि परिचालन लागत बढ़ने से आने वाले दिनों में उड़ानों के टिकट महंगे हो सकते हैं। हालांकि, अंतिम हवाई किराया केवल ईंधन पर ही नहीं, बल्कि पैसेंजर डिमांड, रूट कंपीटिशन और सीटों की उपलब्धता (Dynamic Pricing) पर भी निर्भर करता है।

पेट्रोलियम निर्यात पर अप्रत्याशित लाभ कर (विंडफॉल टैक्स) की स्थिति

एक तरफ घरेलू जेट फ्यूल महंगा हुआ है, वहीं दूसरी ओर सरकार ने हाल ही में पेट्रोल, डीजल और एटीएफ के निर्यात पर लगने वाले अप्रत्याशित लाभ कर (Windfall Tax) में कटौती कर राहत दी थी। 15 अगस्त से प्रभावी पखवाड़े के लिए एटीएफ निर्यात पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) ₹22 प्रति लीटर से घटाकर ₹19.5 प्रति लीटर और डीजल पर ₹25.5 से घटाकर ₹24 प्रति लीटर कर दिया गया था।

पश्चिम एशिया संकट के दौरान घरेलू बाजार में ईंधन की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखने और वैश्विक तेल कीमतों के उछाल से कंपनियों द्वारा लिए जाने वाले अत्यधिक मुनाफे पर अंकुश लगाने के लिए 27 मार्च को यह निर्यात शुल्क लागू किया गया था, जिसकी समीक्षा सरकार द्वारा प्रत्येक पखवाड़े (15 दिनों) में की जाती है।

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