पिछले 10 सालों में मुहूर्त ट्रेडिंग सेशन में क्या-क्या हुआ? कितना बार बाजार चढ़ा, कितनी बार गिरा?

पिछले 10 सालों में मुहूर्त ट्रेडिंग सेशन में क्या-क्या हुआ? कितना बार बाजार चढ़ा, कितनी बार गिरा?

दिवाली के पावन अवसर पर भारतीय शेयर बाजार में होने वाला एक घंटे का विशेष 'मुहूर्त ट्रेडिंग' सत्र केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह देश के करोड़ों निवेशकों के लिए नए संवत वर्ष की वित्तीय समृद्धि और निवेश की शुभ शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। जब भी शेयर बाजार का यह विशेष सत्र आता है, तो निवेशकों और विश्लेषकों के मन में यह उत्सुकता जरूर होती है कि पिछले कुछ वर्षों में इस दौरान बाजार का प्रदर्शन कैसा रहा है और क्या इतिहास हर बार निवेशकों के लिए खुशियां लेकर आया है। यदि हम पिछले 10 वर्षों यानी एक दशक के आंकड़ों पर गहरी नजर डालें, तो पता चलता है कि दलाल स्ट्रीट पर दीपावली के इस एक घंटे के खेल में हमेशा से ही तेजड़ियों (Bulls) का पलड़ा काफी भारी रहा है। इन दस सालों के दौरान अधिकांश अवसरों पर सेंसेक्स और निफ्टी ने हरे निशान के साथ अपनी यात्रा पूरी की है, हालांकि कुछ चुनिंदा मौकों पर मामूली मुनाफावसूली या वैश्विक दबाव के कारण बाजार को हल्की गिरावट का भी सामना करना पड़ा है। इस विशेष रिपोर्ट में हम पिछले 10 सालों के मुहूर्त ट्रेडिंग सत्रों के पूरे लेखा-जोखा और उसके उतार-चढ़ाव की पूरी कहानी विस्तार से विश्लेषण कर रहे हैं, जिससे आपको यह समझने में मदद मिलेगी कि इस एक घंटे के सत्र का बाजार के मिजाज पर कैसा असर पड़ता है।

पिछले एक दशक के आंकड़े: कितनी बार चढ़ा और कितनी बार गिरा मुहूर्त ट्रेडिंग के दौरान बाजार

अगर हम पिछले 10 वर्षों (लगभग संवत 2072 से लेकर संवत 2082-2083 तक) के मुहूर्त ट्रेडिंग सत्रों के रिकॉर्ड की समीक्षा करें, तो यह साफ नजर आता है कि 10 में से लगभग 8 से 9 बार शेयर बाजार ने इस विशेष सत्र का समापन हरे निशान यानी बढ़त के साथ किया है। पारंपरिक रूप से इसे बाजार के निवेशकों के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जाता है क्योंकि दीपावली के दिन निवेशक मां लक्ष्मी की पूजा के साथ-साथ अपने पोर्टफोलियो में नए शेयरों को शामिल करते हैं, जिससे बाजार में एक मजबूत मनोवैज्ञानिक समर्थन मिलता है। केवल एक या दो ऐसे साल आए हैं जब वैश्विक बाजारों की कमजोरी, महंगाई के आंकड़ों या भू-राजनीतिक तनावों के कारण मुहूर्त ट्रेडिंग के दौरान सूचकांकों में हल्की सुस्ती या गिरावट दर्ज की गई हो। विश्लेषकों का मानना है कि इस एक घंटे के सत्र में वॉल्यूम भले ही सामान्य दिनों की तुलना में थोड़ा कम रहता है, लेकिन बाजार की दिशा हमेशा से सकारात्मक ऊर्जा और निवेशकों के भरोसे पर टिकी होती है, यही वजह है कि पिछले एक दशक में अधिकांश समय बाजार मुस्कुराते हुए ही बंद हुआ है।

ऐतिहासिक रूप से क्यों खास होता है यह एक घंटे का विशेष कारोबारी सत्र

कई नए निवेशक अक्सर यह सोचते हैं कि जब दुनिया भर के बाकी शेयर बाजार इस दिन बंद रहते हैं या सामान्य कामकाज नहीं होता, तो भारत में इस एक घंटे के विशेष सत्र का क्या औचित्य है। आपको बता दें कि भारतीय पूंजी बाजार की यह एक ऐसी अनूठी परंपरा है जो पिछले कई दशकों से चली आ रही है और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) तथा नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) दोनों पर इसका विशेष आयोजन किया जाता है। इस दौरान ब्रोकरेज हाउस, अनुभवी निवेशक, खुदरा व्यापारी और दिग्गज कॉर्पोरेट घरानों के लोग प्रतीकात्मक रूप से शेयरों की खरीद-फरोख्त करते हैं। इतिहास गवाह है कि कई बड़े निवेशकों ने मुहूर्त ट्रेडिंग के दिन जिन शेयरों में दांव लगाया था, उन्होंने लंबी अवधि में उन्हें शानदार रिटर्न दिए हैं। यही कारण है कि पिछले 10 वर्षों के दौरान बाजार में चाहे कितनी भी मंदी या तेजी का दौर क्यों न रहा हो, लेकिन मुहूर्त ट्रेडिंग के प्रति निवेशकों का उत्साह कभी कम नहीं हुआ है और हर साल इस सत्र में करोड़ों-अरबों रुपये का सांकेतिक व्यापार होता है।

बाजार जानकारों की राय: क्या मुहूर्त ट्रेडिंग का प्रदर्शन आने वाले पूरे साल की चाल तय करता है?

एक आम धारणा यह भी फैलाई जाती है कि मुहूर्त ट्रेडिंग के दिन बाजार जिस दिशा में बंद होता है, संवत का पूरा साल उसी हिसाब से चलता है, लेकिन वित्तीय विशेषज्ञ और मार्केट एक्सपर्ट्स इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। पिछले 10 सालों के आंकड़ों का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि कई बार ऐसा भी हुआ है कि मुहूर्त ट्रेडिंग के दिन बाजार में मामूली बढ़त या हल्की गिरावट दर्ज की गई, लेकिन आने वाले पूरे साल में सेंसेक्स और निफ्टी ने नए ऑल-टाइम हाई रिकॉर्ड बनाए। इसलिए इस एक घंटे के सत्र को केवल एक सांकेतिक उत्सव और परंपरा के रूप में देखना चाहिए, न कि पूरे साल के रिटर्न का अचूक पैमाना। हालांकि, यह सत्र इस बात का जरूर गवाह बनता है कि भारतीय खुदरा निवेशकों (Retail Investors) की रीढ़ कितनी मजबूत हो चुकी है और वे हर मुश्किल दौर में भी देश की अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार की ताकत पर अटूट विश्वास बनाए रखते हैं।