27 पैसे जेब में लेकर मुंबई आए थे जावेद अख्तर, 3 दिन तक नहीं मिला खाना, फुटपाथ पर गुजरी रातें

27 पैसे जेब में लेकर मुंबई आए थे जावेद अख्तर, 3 दिन तक नहीं मिला खाना, फुटपाथ पर गुजरी रातें

भारतीय सिनेमा जगत में अपनी बेबाक लेखनी, दिल को छू लेने वाले गीतों और दमदार संवादों से इतिहास रचने वाले दिग्गज गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम रोमांचक और संघर्षपूर्ण नहीं रही है। आज के समय में शोहरत और बुलंदी के उस मुकाम पर बैठे हैं जहाँ उनकी एक एक लाइन और विचार पर पूरी दुनिया गौर करती है, लेकिन इस सफलता के पीछे का सफर कांटों भरा और बेहद दर्दनाक रहा है। खुद जावेद अख्तर ने एक इंटरव्यू के दौरान अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए खुलासा किया था कि जब वे पहली बार सपनों के शहर मुंबई की मायानगरी में उतरे थे, तो उनकी जेब में केवल 27 पैसे थे। इस मामूली सी रकम के साथ मुंबई की सड़कों पर कदम रखने वाले एक युवा के लिए यह सोचना भी मुश्किल था कि आने वाले समय में वह इस शहर का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित नाम बनेगा, लेकिन उनके अडिग हौसले ने तमाम बाधाओं को पार कर एक ऐसी दास्तान लिखी जो आज भी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

मुंबई आने के शुरुआती संघर्ष के वे डरावने दिन जब लगातार तीन दिनों तक नहीं मिला था एक वक्त का भोजन

जावेद अख्तर ने अपने संघर्ष के उन शुरुआती पन्नों को पलटते हुए बताया था कि जब वे मुंबई पहुंचे थे, तो उनके पास न तो रहने के लिए कोई छत थी और न ही खाने के लिए पर्याप्त पैसे। हालात इतने बदतर थे कि उन्हें लगातार तीन दिनों तक एक वक्त का भोजन भी नसीब नहीं हुआ था। वे भूखे पेट शहर की लंबी चौड़ी सड़कों पर अपने भविष्य की तलाश में भटकते रहते थे। जब रात होती थी, तो सिर छुपाने के लिए कोई कमरा या होटल नहीं बल्कि मुंबई के व्यस्त और ठंडे फुटपाथ ही उनका ठिकाना बनते थे। सड़क किनारे खुले आसमान के नीचे रातें गुजारना और यह सोचना कि कल सुबह की धूप उनके लिए क्या नया संकट लेकर आएगी, किसी भी सामान्य इंसान के मानसिक और शारीरिक धैर्य को तोड़ने के लिए काफी था। ऐसे विकट और अभावों से भरे समय में भी जावेद अख्तर ने अपने भीतर की जिजीविषा और कला के प्रति अटूट प्रेम को मरने नहीं दिया, और हर मुश्किल परिस्थिति का डटकर सामना करते हुए अपने सपनों को जिंदा रखा, जिसका परिणाम आज पूरी दुनिया के सामने एक लीजेंड के रूप में मौजूद है।

कैसे एक साधारण संघर्षशील युवा ने अपनी बेजोड़ कलम के दम पर मायानगरी में गढ़ी अपनी अनूठी पहचान

फुटपाथ की रातों और भूखे पेट की उन दुश्वारियों से निकलकर जावेद अख्तर ने हार मानने के बजाय अपनी किस्मत को खुद लिखने की ठानी। उन्होंने फिल्मों में छोटे-मोटे काम की तलाश जारी रखी, लोगों से संपर्क बनाए और अपनी असाधारण लेखन कला को तराशते रहे। किस्मत ने तब करवट ली जब उनकी मुलाकात सलीम खान से हुई, और इसके बाद भारतीय सिनेमा को 'सलीम-जावेद' की वह जादुई जोड़ी मिली जिसने हिंदी सिनेमा के इतिहास की धारा ही हमेशा के लिए बदल दी। 'दीवार', 'शोले', 'जंजीर' और 'डॉन' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों की पटकथा और संवाद लिखकर इस जोड़ी ने बॉक्स ऑफिस के तमाम पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए और सिनेमाई दुनिया में एक नया आयाम स्थापित किया। जावेद अख्तर की सफलता इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि इंसान की असली ताकत उसके बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि उसके बुलंद हौसले, अटूट मेहनत और अपने हुनर पर पूरा भरोसा रखने में होती है, जो किसी भी शून्य से उठकर उसे आसमान की बुलंदियों तक पहुंचा सकती है।

आज की युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणादायक मिसाल है जावेद अख्तर का यह संघर्षपूर्ण और गौरवशाली जीवन सफर

आज जब लोग जावेद अख्तर को एक महान गीतकार, पद्म श्री, पद्म भूषण और साहित्य जगत के तमाम प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित शख्सियत के रूप में देखते हैं, तो उनके लिए यह विश्वास करना मुश्किल होता है कि इस लीजेंड ने अपने जीवन के शुरुआती दौर में कितनी भयानक तकलीफें झेली थीं। उनका यह जीवन सफर आज की उस युवा पीढ़ी के लिए एक सबसे बड़ी और खूबसूरत सीख है जो जरा-जरा सी असफलता मिलने पर या संसाधनों की कमी का रोना रोकर अपने सपनों का गला घोंट देती है। जावेद अख्तर साबित करते हैं कि यदि आपके भीतर कुछ कर दिखाने का जज्बा हो, आपकी कलम में सच्चाई और ताकत हो, और आप मुश्किलों के आगे घुटने टेकने के बजाय उससे लड़ना जानते हैं, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको सफल होने से नहीं रोक सकती। उनकी यह कहानी इस बात की गवाही देती है कि मुंबई जैसी मायानगरी अपनी चौखट पर आने वाले हर उस शख्स को गले लगाती है जो यहां की कठिनाइयों को सीढ़ बनाकर आसमान छूने का माद्दा रखता है, और यही वजह है कि जावेद अख्तर का नाम आज भारतीय संस्कृति और सिनेमा के इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो चुका है।