सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर केंद्र की अर्जी पर सुनवाई से किया साफ इनकार
भारत के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण और जैव-विविधता से परिपूर्ण द्वीप समूह को लेकर इन दिनों देश की सर्वोच्च अदालत में सुनवाई का दौर जारी है, जहां एक बार फिर पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच एक बड़ा वैधानिक और वैचारिक संघर्ष देखने को मिला है। देश के बहुचर्चित और विशाल 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' (Great Nicobar Project) से जुड़ी एक कानूनी अर्जी पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक बेहद तीखी और विचारोत्तेजक टिप्पणी दी है, जिसने पर्यावरणविदों, नीति निर्माताओं और आदिवासी कल्याण से जुड़े संगठनों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अदालत ने सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट सवाल उठाया कि क्या अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की प्राचीन, संवेदनशील और विलुप्तप्राय जनजातियां जैसे कि ग्रेट अंडमानी और शोंपेन जनजाति को जबरन आधुनिक विकास की मुख्यधारा में मिला दिया जाना चाहिए, या फिर उनकी विशिष्ट पहचान और अस्तित्व को बचाने के लिए कुछ और ठोस उपाय किए जाने चाहिए। इस बेहद संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र की अर्जी पर तत्काल विचार करने से इनकार करने के बाद से यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर बहस का मुख्य केंद्र बन गया है, और हर कोई यह जानने के लिए उत्सुक है कि क्या इस मेगा प्रोजेक्ट के चलते इन आदिम जनजातियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट और क्यों इसे लेकर छिड़ा है कानूनी और पर्यावरणीय विवाद?
केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी योजनाओं में शामिल 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' एक ऐसा विशाल एकीकृत बुनियादी ढांचा विकास कार्यक्रम है, जिसके तहत उस सुदूर द्वीप पर एक ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट, हवाई अड्डा, पावर प्लांट और एक बड़े टाउनशिप का निर्माण किया जाना है। सरकार का यह तर्क है कि भू-राजनीतिक (Geopolitical) और सामरिक दृष्टि से हिंद महासागर में अपनी पकड़ मजबूत करने और देश की आर्थिक गतिविधियों को गति देने के लिए यह प्रोजेक्ट बेहद आवश्यक है। हालांकि, शुरुआत से ही पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस परियोजना का कड़ा विरोध किया है, क्योंकि इस प्रोजेक्ट के रास्ते में लाखों की संख्या में प्राचीन पेड़ों को काटा जाना है और उस क्षेत्र में रहने वाली दुर्लभ वनस्पतियों तथा वन्यजीवों के आवास को भारी नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा, सबसे बड़ी चिंता उन मूलनिवासी जनजातियों को लेकर है जो हजारों सालों से बाहरी दुनिया से कटे हुए पूरी तरह से प्रकृति की गोद में अपनी एक स्वतंत्र और पारंपरिक जीवनशैली जीते आ रहे हैं, और इस आधुनिक विकास की आंधी में उनके विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।
शोंपेन और ग्रेट अंडमानी जनजातियों की सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट की गहरी चिंता
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि देश के विकास के नाम पर हम उन मूलनिवासी समुदायों की उपेक्षा नहीं कर सकते जो इस देश के सबसे पहले नागरिक हैं और जिनकी संस्कृति व भाषा को बचाने की जिम्मेदारी पूरे राष्ट्र की है। 'शोंपेन' (Shompen) और 'ग्रेट अंडमानी' (Great Andamanese) जैसी जनजातियां इतनी संवेदनशील हैं कि वे बाहरी दुनिया के संपर्क में आने से ही कई प्रकार की गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाती हैं और उनका इम्यून सिस्टम आधुनिक समाज के अनुकूल नहीं है। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि क्या विकास का मतलब यह है कि इन आदिम जनजातियों को उनकी प्राचीन जड़ों से उखाड़कर कृत्रिम रूप से मुख्यधारा में धकेल दिया जाए? न्यायालय की इस टिप्पणी ने केंद्र सरकार और संबंधित प्रशासनिक विभागों के सामने यह गंभीर नैतिक और कानूनी सवाल खड़ा कर दिया है कि वे आदिवासियों के अधिकारों और पर्यावरण की रक्षा के बिना किसी भी प्रोजेक्ट को आगे कैसे बढ़ा सकते हैं।
पर्यावरणीय संतुलन और विकास के बीच संतुलन बिठाने की देश के सामने बड़ी चुनौती
आज के दौर में जब एक तरफ देश को आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिए बड़े-बड़े बुनियादी ढांचे और औद्योगिक गलियारों की आवश्यकता है, तो दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और जैव-विविधता का क्षय भी मानवता के सामने सबसे बड़ा संकट बनकर उभर रहा है। ग्रेट निकोबार द्वीप का वह घना जंगल न केवल भारत का एक प्राकृतिक फेफड़ा है, बल्कि वह दुनिया के कई दुर्लभ जीवों का एकमात्र प्राकृतिक घर भी है। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से यह स्पष्ट हो गया है कि न्यायपालिका पर्यावरण और मानवाधिकारों के मामलों में कितनी अधिक सतर्क और गंभीर है। सरकार और नीति निर्माताओं को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि यदि कोई राष्ट्रीय परियोजना चलाई भी जाती है, तो उससे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) और स्थानीय जनजातीय संस्कृति को कम से कम नुकसान पहुंचे। आने वाले दिनों में इस मामले पर जब अदालत में अगली सुनवाई होगी, तो यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि सरकार आदिवासियों और पर्यावरण के हितों की रक्षा के लिए क्या ठोस और अकाट्य हलफनामा पेश करती है।