रामायण के लक्ष्मण यानी सुनील लहरी ने माता-पिता को दी अनमोल सीख

रामायण के लक्ष्मण यानी सुनील लहरी ने माता-पिता को दी अनमोल सीख

देश के सबसे प्रतिष्ठित और सर्वोच्च शिक्षण संस्थानों में शुमार भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे से हाल ही में सामने आई एक अत्यंत दुखद और झकझोर देने वाली घटना ने पूरे देश के अभिभावकों, शिक्षाविदों और युवाओं को अंदर से हिला कर रख दिया है। उच्च शिक्षण संस्थानों में लगातार बढ़ रहे मानसिक दबाव, डिप्रेशन और छात्रों द्वारा उठाए जा रहे चरम कदमों ने समाज के सामने एक बहुत बड़ा और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर आज की नई पीढ़ी को किस प्रकार संभाला जाए। इस दर्दनाक वाकये के बाद, रामानंद सागर के लोकप्रिय पौराणिक धारावाहिक 'रामायण' में भगवान श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण का अमर किरदार निभाकर घर-घर में अपनी एक खास पहचान बनाने वाले मशहूर अभिनेता सुनील लहरी ने माता-पिता के नाम एक बहुत ही मार्मिक और गहरा संदेश दिया है। उन्होंने अपने अनोखे अंदाज और एक सटीक मुहावरे के जरिए आज की 'जेन जेड' (Gen Z) यानी आधुनिक तकनीक की गोद में पलने वाली युवा पीढ़ी को संभालने और उनके साथ पेश आने का एक बेहद व्यावहारिक तरीका देश के सामने रखा है, जिसकी चर्चा इस समय चारों तरफ हो रही है।

उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों पर बढ़ता मानसिक दबाव और IIT बॉम्बे की घटना का गहरा असर

जब देश का कोई युवा अपनी कड़ी मेहनत और प्रतिभा के बल पर आईआईटी जैसे देश के सबसे कठिन और प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पाता है, तो पूरा परिवार और समाज गर्व महसूस करता है। लेकिन हाल ही में आईआईटी बॉम्बे के परिसर से जो बुरी खबरें सामने आईं, उन्होंने यह साबित कर दिया कि केवल किताबी ज्ञान और बड़ी डिग्रियां ही किसी युवा के मानसिक स्वास्थ्य की गारंटी नहीं हो सकती हैं। आज के इस अत्यधिक प्रतिस्पर्धी युग में छात्रों पर बेहतर प्रदर्शन करने, अकादमिक उम्मीदों पर खरा उतरने और भविष्य की अनिश्चितताओं का लगातार दबाव बना रहता है, जिसके चलते कई बार वे अंदर से पूरी तरह टूट जाते हैं। इस तरह की दर्दनाक घटनाएं हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि हम अपनी शिक्षा प्रणाली और पारिवारिक परिवेश में कहीं न कहीं कोई बहुत बड़ी चूक कर रहे हैं, जहाँ हमारे बच्चे सफलता और असफलता के बीच के अंतर को सहन करने में असमर्थ होते जा रहे हैं।

'रामायण' के लक्ष्मण यानी अभिनेता सुनील लहरी का बेबाक बयान और माता-पिता के लिए अमूल्य सलाह

इस पूरे राष्ट्रीय संवेदनशील मुद्दे पर अपने विचार रखते हुए अभिनेता सुनील लहरी ने एक साक्षात्कार के दौरान आधुनिक अभिभावकों को बहुत ही गहराई से सोचने वाली बात कही है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में माता-पिता अक्सर अपने बच्चों को महंगे खिलौने, गैजेट्स और सुख-सुविधाएं तो भरपूर दे देते हैं, लेकिन उनके साथ वह भावनात्मक जुड़ाव और खुला संवाद खो बैठते हैं जो एक बच्चे के मानसिक विकास के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है। अभिनेता ने एक पुराने मुहावरे का जिक्र करते हुए समझाया कि जैसे हम गीली मिट्टी को जिस सांचे में चाहें ढाल सकते हैं, ठीक उसी तरह बच्चों के मन में पनप रहे डर और तनाव को यदि समय रहते उनके दोस्त बनकर न समझा जाए, तो वह मिट्टी बाद में इतनी कठोर हो जाती है कि उसे संभालना नामुमकिन हो जाता है। उनका यह बयान हर उस माता-पिता के लिए एक चेतावनी और मार्गदर्शन दोनों है जो अपने बच्चों की प्रोफेशनल सक्सेस के चक्कर में उनकी मानसिक खुशियों को नजरअंदाज कर देते हैं।

आधुनिक 'Gen Z' पीढ़ी की यूनीक मानसिकता और उन्हें संभालने के लिए पैरेंट्स को बदलने होंगे तौर-तरीके

आज की इस नई 'जेन जेड' पीढ़ी के सोचने का तरीका, उनकी प्राथमिकताएं और जीवन को देखने का नजरिया पिछली पीढ़ियों से बिल्कुल अलग और आधुनिक हो चुका है। ये युवा तकनीक से लैस, स्वतंत्र विचारों वाले और बहुत जल्दी परिणाम चाहने वाले होते हैं, लेकिन कई बार इनके भीतर विपरीत परिस्थितियों का सामना करने यानी रेसिलिएंस (Resilience) की थोड़ी कमी देखने को मिलती है। जब ये बच्चे अपनी उम्मीद के मुताबिक परिणाम हासिल नहीं कर पाते, तो वे अपने मन की बात अपने माता-पिता से शेयर करने के बजाय अकेलेपन और डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। सुनील लहरी ने इसी बात पर जोर दिया है कि पैरेंट्स को अपने बच्चों पर अपनी महत्वाकांक्षाओं का बोझ थोपने के बजाय उनके साथ एक ऐसा दोतरफा संवाद स्थापित करना चाहिए जहाँ बच्चा अपनी हर असफलता और कमजोरी को बिना किसी डर के अपने माता-पिता के सामने खुलकर रख सके।

समाज, शिक्षा प्रणाली और परिवार की संयुक्त जिम्मेदारी से ही रोकी जा सकती हैं ऐसी दुखद घटनाएं

आईआईटी बॉम्बे जैसी घटनाओं से केवल शोक व्यक्त कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए देश के पूरे शैक्षिक ढांचे और सामाजिक ताने-बाने में एक सकारात्मक बदलाव लाने की आवश्यकता है। शिक्षण संस्थानों में अकादमिक पढ़ाई के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य परामर्श (Mental Health Counseling) और तनाव प्रबंधन के विशेष सत्र अनिवार्य किए जाने चाहिए ताकि छात्र कभी भी खुद को अकेला या असहाय महसूस न करें। इसके साथ ही, परिवारों में भी यह संस्कृति विकसित होनी चाहिए कि असफलता जीवन का अंत नहीं है, बल्कि वह सीखने की सीढ़ी है। सुनील लहरी द्वारा दी गई यह सीख और मुहावरे का यह संदेश हमें यह याद दिलाता है कि बच्चे हमारी संपत्ति नहीं बल्कि हमारे भविष्य की अमूल्य धरोहर हैं, जिनकी सुरक्षा और मानसिक सुकून हमारी सबसे पहली और बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए।