Up kiran,Digital Desk : केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी और रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण 'ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना' को कानूनी मोर्चे पर बड़ी जीत मिली है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने इस मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को अपनी मंजूरी दे दी है। एनजीटी की पूर्वी जोनल बेंच ने स्पष्ट किया कि पर्यावरणीय स्वीकृति में सुरक्षा के पर्याप्त उपाय किए गए हैं, इसलिए परियोजना में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, इस फैसले के साथ ही विकास और पर्यावरण के बीच एक नई बहस भी छिड़ गई है।
इन विशाल परियोजनाओं को मिली मंजूरी
एनजीटी के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की पीठ ने जिन प्रमुख कार्यों को हरी झंडी दिखाई है, उनमें शामिल हैं:
इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल: यह वैश्विक व्यापार का नया केंद्र बनेगा।
स्मार्ट सिटी और टाउनशिप: द्वीप पर आधुनिक क्षेत्रीय विकास।
पावर प्लांट: 450 MVA क्षमता का गैस और सौर ऊर्जा आधारित हाइब्रिड बिजली घर।
ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट: रणनीतिक और नागरिक हवाई यातायात के लिए।
NGT की शर्तें: विकास के साथ संरक्षण का 'कवच'
ट्रिब्यूनल ने माना कि यह प्रोजेक्ट भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए अनिवार्य है, लेकिन साथ ही पर्यावरण सुरक्षा के लिए कड़े निर्देश भी दिए हैं:
वन्यजीव संरक्षण: लेदरबैक कछुए, निकोबार मेगापोड पक्षी, खारे पानी के मगरमच्छ और निकोबार मकाक के आवासों की रक्षा अनिवार्य है।
कोरल और मैंग्रोव: निर्माण के दौरान नष्ट होने वाली मूंगे की चट्टानों (Corals) और मैंग्रोव वनों का पुनर्स्थापन किया जाएगा।
जनजातीय हितों की रक्षा: 'शोम्पेन' और 'निकोबारी' जैसी आदिम जनजातियों के जीवन और अधिकारों से कोई समझौता नहीं होगा।
तटरेखा सुरक्षा: द्वीप के रेतीले समुद्र तटों को सुरक्षित रखा जाएगा ताकि कछुओं के प्रजनन स्थलों को नुकसान न पहुंचे।
भारत के लिए क्यों है यह 'गेम-चेंजर'?
ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति इसे भारत का सबसे शक्तिशाली समुद्री आधार बनाती है:
मलक्का जलडमरूमध्य के पास: यह द्वीप दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग 'मलक्का स्ट्रेट' के प्रवेश द्वार पर स्थित है। यहाँ टर्मिनल बनने से भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) का मुख्य हिस्सा बन जाएगा।
रणनीतिक बढ़त: हिंद महासागर में बढ़ती चीन की गतिविधियों पर नजर रखने और भारतीय नौसेना की निगरानी क्षमता बढ़ाने के लिए यह स्थान 'अजेय' माना जा रहा है।
आर्थिक लाभ: सिंगापुर और कोलंबो जैसे पोर्ट्स पर निर्भरता कम होगी और भारत एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में उभरेगा।
विरोध की गूंज: सोनिया गांधी और पर्यावरणविदों की चिंता
मंजूरी के बावजूद, इस प्रोजेक्ट का विरोध भी उतना ही प्रखर है।
जंगलों का सफाया: कांग्रेस नेता सोनिया गांधी सहित कई विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस प्रोजेक्ट के लिए करीब 8.5 लाख से 58 लाख तक पेड़ काटे जा सकते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पूरी तरह नष्ट हो सकता है।
पारिस्थितिक नुकसान: मूंगे की चट्टानों का विनाश और दुर्लभ प्रजातियों के विलुप्त होने का डर बना हुआ है।
जनजातीय अस्तित्व: विशेषज्ञों का मानना है कि बाहरी हस्तक्षेप से यहाँ की संरक्षित जनजातियों के अस्तित्व पर संकट आ सकता है।



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