Up kiran,Digital Desk : 24 अप्रैल 2026 की तारीख आम आदमी पार्टी (AAP) के इतिहास में एक 'ब्लैक फ्राइडे' के तौर पर दर्ज हो गई है। अरविंद केजरीवाल के बेहद भरोसेमंद सिपहसालार रहे राघव चड्ढा से लेकर क्रिकेट स्टार हरभजन सिंह तक, कई सांसदों ने एक साथ पार्टी का दामन छोड़कर भाजपा का हाथ थाम लिया। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की नहीं है कि कितने चेहरे गए, बल्कि चर्चा उस एक नाम की है जिसने केजरीवाल के 'संगठन' की ईंट-ईंट जोड़ी थी। जानकारों का मानना है कि राघव चड्ढा के जाने से केवल सुर्खियां बनीं, लेकिन संदीप पाठक के भाजपा में जाने से 'आप' के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो गया है।
संदीप पाठक: वो 'चाणक्य' जिसने केजरीवाल का साम्राज्य बनाया
आम आदमी पार्टी में संदीप पाठक केवल एक राज्यसभा सांसद नहीं थे। उन्हें पार्टी के भीतर 'साइलेंट रणनीतिकार' माना जाता था।
पंजाब की ऐतिहासिक जीत: 2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की प्रचंड जीत के पीछे संदीप पाठक का ही दिमाग था। उन्होंने बूथ लेवल तक संगठन को खड़ा किया था।
संगठन के 'आयरन मैन': पाठक को पार्टी का राष्ट्रीय संगठन महासचिव बनाया गया था। वे सीधे तौर पर केजरीवाल के बाद पार्टी के दूसरे सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन चुके थे।
केजरीवाल के राजदार: जब अरविंद केजरीवाल जेल में थे, तब उनसे मिलने के लिए केवल तीन लोगों को अधिकृत किया गया था—सुनीता केजरीवाल, बिभव कुमार और संदीप पाठक। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि केजरीवाल उन पर कितना भरोसा करते थे।
राघव चड्ढा और हरभजन का जाना 'उम्मीद' के मुताबिक!
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि राघव चड्ढा की लोकप्रियता सोशल मीडिया और टीवी पर जरूर अधिक थी, लेकिन पिछले डेढ़ साल से वे पार्टी की आंतरिक गतिविधियों से कटे हुए थे। उनका जाना एक तरह से तय माना जा रहा था। वहीं, हरभजन सिंह का झुकाव पहले ही क्रिकेट और अन्य गतिविधियों की ओर अधिक था। ईडी (ED) की रेड के बाद अशोक मित्तल का पाला बदलना भी राजनीतिक मजबूरी माना जा रहा है।
"पार्टी को राघव चड्ढा या स्वाति मालीवाल के जाने से उतना दुख नहीं हुआ, जितना संदीप पाठक को भाजपा के मंच पर देखकर हुआ होगा। वे पार्टी के कोर-ग्रुप का हिस्सा थे और उनके पास 'आप' की विस्तार योजनाओं का पूरा ब्लूप्रिंट था।"
— पार्टी सूत्रों के हवाले से
संगठन अब 'भगवान भरोसे'?
संदीप पाठक केवल रणनीति नहीं बनाते थे, बल्कि वे गुजरात, गोवा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में पार्टी के विस्तार का चेहरा थे। उनके जाने से आम आदमी पार्टी के पास अब ऐसा कोई नेता नहीं बचा है जो देशभर में संगठन की बारीकियों को समझता हो। 2016 में पार्टी में शामिल होने वाले पाठक ने दिल्ली डायलॉग कमीशन से अपना सफर शुरू किया था और देखते ही देखते केजरीवाल के सबसे करीबी बन गए थे।
पार्टी के सामने अब क्या है चुनौती?
संदीप पाठक के साथ बागी गुट ने एक तिहाई सदस्यों के साथ भाजपा में विलय किया है। यह 'आप' के संसदीय दल की अब तक की सबसे बड़ी टूट है। अरविंद केजरीवाल के लिए यह दोहरा झटका है—एक तरफ कानूनी लड़ाइयां और दूसरी तरफ अपनी ही टीम का बिखर जाना। अब देखना यह होगा कि केजरीवाल अपने बिखरे हुए कुनबे को कैसे संभालते हैं और संदीप पाठक की जगह कौन सा नया 'रणनीतिकार' लेता है।




