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कहीं आप भी तो नहीं थकी-थकी रहती हैं, महिलाओं में बिना वजह आलस और बदन दर्द है इस गंभीर बीमारी का अलार्म

भारतीय समाज में महिलाएं अक्सर पूरे घर की सेहत और खान-पान का ख्याल रखती हैं, लेकिन जब बात खुद के स्वास्थ्य की आती है, तो वे उसे सबसे आखिरी पायदान पर रख देती हैं। चिकित्सा विज्ञान और लांसेट (The Lancet) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भले ही पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की औसत आयु (Life Expectancy) अधिक होती है, लेकिन लंबी उम्र का मतलब यह कतई नहीं है कि वे पूरी तरह स्वस्थ हैं। आज के समय में करोड़ों महिलाएं बिना किसी ठोस कारण के लगातार थकान, सिर भारी होना, चिड़चिड़ापन और जोड़ों में दर्द महसूस कर रही हैं। ज्यादातर महिलाएं इसे काम का तनाव या नींद की कमी मानकर नजरअंदाज कर देती हैं, जो आगे चलकर बेहद दर्दनाक और क्रोनिक बीमारियों का रूप ले लेती हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, शरीर में दिखने वाले ये छोटे-छोटे लक्षण असल में किसी गंभीर न्यूट्रिशन डेफिसिसी, थायराइड या एनीमिया जैसी छिपी हुई बीमारियों के शुरुआती अलार्म होते हैं।

भारत की 57 फीसदी महिलाएं हैं एनीमिया की शिकार, प्रजनन उम्र में सेहत से खिलवाड़ पड़ रहा है भारी

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के नवीनतम और बेहद चौंकाने वाले आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 15 से 49 वर्ष की प्रजनन आयु वर्ग की लगभग 57 प्रतिशत महिलाएं गंभीर रूप से एनीमिया (खून की कमी) से पीड़ित हैं। शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी के कारण ऑक्सीजन का प्रवाह ठीक से नहीं हो पाता, जिससे शरीर हर वक्त थका-थका और बेजान महसूस होता है। इतना ही नहीं, लिंग भेद और पोषण संबंधी असमानता के कारण छोटी उम्र से ही बच्चियों को सही खान-पान नहीं मिल पा रहा है। इसी का नतीजा है कि प्रजनन अवधि के दौरान और गर्भावस्था में खून की कमी न केवल मां के जीवन की गुणवत्ता को खराब कर रही है, बल्कि होने वाले बच्चे की सेहत को भी सीधे तौर पर प्रभावित कर रही है। इसके साथ ही पिछले कुछ सालों में महिलाओं में मोटापे का ग्राफ भी 24 प्रतिशत से बढ़कर सीधे 30.7 प्रतिशत के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।

ऑफिस में सपोर्ट न मिलने से 50% बढ़ता है बर्नआउट, एंग्जाइटी और डिप्रेशन के मामलों में 123% का रिकॉर्ड उछाल

ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में साल 1990 के बाद से महिलाओं में एंग्जाइटी (चिंता) और मानसिक तनाव से जुड़े मामलों में 123 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मानसिक परेशानियां सिर्फ दिमाग तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि ये सीधे तौर पर महिला के व्यवहार, सोने के पैटर्न, पीरियड्स के हार्मोन्स और दिल की सेहत को बुरी तरह प्रभावित करती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट बताती है कि जो महिलाएं कामकाजी हैं और जिन्हें अपने वर्कप्लेस (कार्यस्थल) पर उचित मानसिक व सामाजिक सपोर्ट नहीं मिलता, उनमें मानसिक रूप से पूरी तरह टूटने यानी 'बर्नआउट' का खतरा 50 प्रतिशत तक ज्यादा रहता है। इसके कारण उनके शरीर में क्रोनिक दर्द और मांसपेशियों के विकार तेजी से पनपने लगते हैं।

40 की उम्र के बाद एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी है बड़ा विलेन, दिल की बीमारियों का बढ़ा खतरा

दिल्ली के प्रतिष्ठित सफदरजंग अस्पताल की मेडिसिन विभाग की प्रोफेसर डॉ. रूपाली मलिक के अनुसार, महिलाओं की सेहत को अक्सर सिर्फ उनके मातृ और प्रजनन स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जाता है, जो कि बिल्कुल गलत है। इसके कारण 40 की उम्र के बाद महिलाओं के शरीर में होने वाली क्रोनिक बीमारियों की पूरी तरह अनदेखी हो जाती है। 40 की उम्र पार करते ही महिलाओं के शरीर में 'एस्ट्रोजन' हार्मोन का स्तर तेजी से गिरने लगता है। यह हार्मोन न केवल मासिक चक्र को नियमित करता है, बल्कि हड्डियों में कैल्शियम का स्तर बनाए रखने और हृदय की रक्तवाहिकाओं को लचीला रखने के लिए सबसे जरूरी माना जाता है। एस्ट्रोजन की इस प्राकृतिक कमी और खराब जीवनशैली के कारण आजकल महिलाओं में साइलेंट हार्ट अटैक और गंभीर जोड़ों के दर्द (लोअर बैक पेन) की समस्या पुरुषों के मुकाबले कई गुना ज्यादा देखी जा रही है।

मोबाइल-इंटरनेट की लत और देरी से शादी ने बढ़ाया पीसीओडी और इनफर्टिलिटी का ग्राफ

इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल दिल्ली की वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. नीलम सूरी बताती हैं कि आधुनिक युग में गैजेट्स, जंक फूड और इंटरनेट मीडिया पर बढ़ती निर्भरता के कारण कम उम्र की लड़कियां तेजी से मोटापे और पीसीओडी (PCOD) की शिकार हो रही हैं। शारीरिक सक्रियता कम होने और देर रात तक जागने की आदतों के कारण हार्मोन्स पूरी तरह असंतुलित हो रहे हैं। इसके अलावा, करियर और अन्य कारणों से देरी से शादी करना और अधिक उम्र में मां बनने का फैसला भी महिलाओं के आंतरिक स्वास्थ्य पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। बदलते पर्यावरण और केमिकल युक्त खान-पान के चलते महिलाओं में ब्रेस्ट और ओवेरियन कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां भी बहुत तेजी से पैर पसार रही हैं, जिससे बचने के लिए समय रहते लाइफस्टाइल में कड़े सुधार करने की सख्त जरूरत है।

केवल कैलोरी जलाना नहीं है एक्सरसाइज का मकसद, आज ही से अपने रूटीन में शामिल करें ये 5 गोल्डन नियम

अक्सर महिलाएं यह तर्क देती हैं कि वे दिन भर घर का कामकाज करती हैं, इसलिए उन्हें अलग से कसरत या टहलने की जरूरत नहीं है। डॉक्टरों ने इस धारणा को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि घर का काम तनाव बढ़ाता है, जबकि खुद के लिए निकाली गई कसरत शरीर को हील करती है। एक्सरसाइज करने से न केवल कैलोरी बर्न होती है, बल्कि पूरे शरीर में शुद्ध ऑक्सीजन और रक्त का संचार बढ़ता है, जो पाचन क्रिया और प्रजनन अंगों को दुरुस्त करता है। महिलाओं को अपनी सेहत सुधारने के लिए छोटे-छोटे कदमों से शुरुआत करनी चाहिए:

  • पोषक तत्वों से भरपूर डाइट: अपने दैनिक आहार में पैकेट बंद जंक फूड और अत्यधिक तैलीय खाने को पूरी तरह बंद कर दें। भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियां, ताजे मौसमी फल, दालें, दूध और भीगे हुए नट्स को अनिवार्य रूप से शामिल करें।

  • प्लांट बेस्ड कच्चा भोजन: भोजन की थाली में अंकुरित अनाज, सलाद और कच्चे फाइबर को जगह दें। यह पाचन तंत्र को मजबूत करता है और पेट से जुड़ी बीमारियों को जड़ से खत्म करता है।

  • गैजेट्स से दूरी और गहरी नींद: रात को समय पर सोने की आदत डालें। अच्छी और गहरी नींद के लिए बिस्तर पर जाने से कम से कम एक घंटे पहले स्मार्टफोन, टीवी और सभी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स को खुद से बिल्कुल दूर कर दें।

  • स्ट्रेंथ ट्रेनिंग: 30 और 40 की उम्र के बाद हड्डियों और मांसपेशियों को कमजोर होने से बचाने के लिए टहलने के साथ-साथ हल्का वजन उठाने या स्ट्रेंथ ट्रेनिंग पर विशेष ध्यान दें।

 

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