पुरुषों से बिल्कुल जुदा हैं महिलाओं में हार्ट अटैक के लक्षण, डॉक्टर भी खा जाते हैं धोखा
आज के दौर की भागदौड़ भरी जिंदगी और अनहेल्दी लाइफस्टाइल के कारण दिल की बीमारियां (Heart Diseases) तेजी से पैर पसार रही हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि महिलाओं के दिल की सेहत पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा संवेदनशील और अलग होती है? चौंकाने वाली बात यह है कि दुनिया भर में महिलाओं में दिल की बीमारियों से होने वाली मौतें, सभी तरह के कैंसर से होने वाली मौतों के मुकाबले कहीं अधिक हैं। इसके बावजूद महिलाओं की कार्डियक हेल्थ को लेकर समाज में जागरूकता बेहद कम है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, महिलाओं में हार्ट अटैक आने के कारण और उसके शुरुआती लक्षण पुरुषों से बिल्कुल भिन्न होते हैं। यही वजह है कि कई बार शुरुआती दौर में बड़े-से-बड़े और अनुभवी डॉक्टर भी इसके लक्षणों को पहचानने में धोखा खा जाते हैं और मरीज को सही समय पर इलाज नहीं मिल पाता।
क्यों फेल हो जाती हैं स्टैंडर्ड मेडिकल जांचें? महिलाओं के रिस्क फैक्टर्स को समझना बेहद जरूरी
अक्सर देखा गया है कि जो स्टैंडर्ड मेडिकल टेस्ट पुरुषों के ब्लॉकेज और हार्ट की समस्याओं को तुरंत पकड़ लेते हैं, वे महिलाओं के मामले में कई बार सटीक नतीजे नहीं दे पाते। शोधकर्ताओं का मानना है कि महिलाओं के शरीर की बनावट और धमनियों का लचीलापन पुरुषों से अलग होता है। जहां पुरुषों में सीने में तेज दर्द और बायीं बांह में झनझनाहट जैसे क्लासिक लक्षण दिखाई देते हैं, वहीं महिलाओं में अत्यधिक थकान, सांस फूलना, पीठ या जबड़े में दर्द और जी मिचलाने जैसे साइलेंट लक्षण सामने आते हैं। इन सामान्य दिखने वाले लक्षणों के पीछे छिपे रिस्क फैक्टर्स को न तो खुद महिलाएं गंभीरता से लेती हैं और न ही शुरुआती जांच में यह आसानी से पकड़ में आते हैं, जिससे खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
गर्भावस्था के दौरान की ये 2 बड़ी दिक्कतें बनती हैं भविष्य में हार्ट अटैक की मुख्य वजह
मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, महिलाओं के जीवन में प्रेग्नेंसी का दौर उनके दिल की सेहत का सबसे बड़ा टेस्ट होता है। जिन महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान 'प्री-एक्लेंपसिया' (हाई ब्लड प्रेशर की गंभीर स्थिति) या 'जेस्टेशनल डायबिटीज' (गर्भावस्था के दौरान होने वाली शुगर) जैसी परेशानियां होती हैं, उनमें डिलीवरी के 15 से 20 साल बाद दिल की बीमारियां होने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अधिकांश महिला मरीज डॉक्टर के पास जाने पर अपनी पुरानी प्रेग्नेंसी हिस्ट्री या 20 साल पहले हुई इन दिक्कतों का जिक्र नहीं करतीं और न ही डॉक्टर इस दिशा में पूछताछ करते हैं, जिससे बीमारी की जड़ तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
पीसीओएस और ऑटोइम्यून बीमारियां कैसे चुपके से कमजोर कर देती हैं महिलाओं का दिल
आजकल की युवा महिलाओं में पॉलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) की समस्या बेहद आम हो चुकी है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि पीसीओएस सीधे तौर पर दिल की बीमारियों के जोखिम को बढ़ा देता है। इसके अलावा ल्यूपस (Lupus) और रूमेटाइड आर्थराइटिस जैसी गंभीर ऑटोइम्यून बीमारियां, जो पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में कहीं ज्यादा देखी जाती हैं, वे भी धमनियों के अंदरूनी हिस्से को भारी नुकसान पहुंचाती हैं। ये बीमारियां शरीर के भीतर एक साइलेंट सूजन (Inflammation) पैदा करती हैं, जो आगे चलकर हार्ट अटैक और स्ट्रोक का बड़ा कारण बनती हैं।
मेनोपॉज के बाद अचानक क्यों बढ़ जाता है खतरा? एस्ट्रोजन हार्मोन के घटने का पूरा गणित समझें
महिलाओं के शरीर में 45 वर्ष की उम्र के बाद होने वाला मेनोपॉज (Menopause) उनके दिल के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट होता है। दरअसल, महिलाओं के शरीर में बनने वाला एस्ट्रोजन हार्मोन उनकी रक्त वाहिकाओं और दिल को एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच प्रदान करता है। इसी वजह से महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले हार्ट की बीमारी की आशंका अक्सर 10 साल बाद यानी उम्र बढ़ने पर देखी जाती है। लेकिन जैसे ही मेनोपॉज का दौर शुरू होता है, शरीर में एस्ट्रोजन का स्तर तेजी से गिरने लगता है। इसके कम होते ही अचानक ब्लड प्रेशर और बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने लगता है, जिससे धमनियों का लचीलापन कम हो जाता है। यही कारण है कि अच्छा खानपान और नियमित व्यायाम करने के बावजूद इस उम्र में महिलाओं को कोलेस्ट्रॉल की गंभीर समस्या घेर लेती है।
20 और 30 की उम्र की लापरवाही बुढ़ापे में पड़ेगी भारी, दिल को जवान रखने के लिए आज ही अपनाएं ये आदतें
हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल जैसी बीमारियों का असर शरीर में रातोंरात नहीं बल्कि दशकों तक धीरे-धीरे जमा होता रहता है। इसलिए आप अपनी 20 और 30 साल की उम्र में जो भी लाइफस्टाइल अपनाते हैं, उसका सीधा असर आपकी 50 और 60 की उम्र पर पड़ता है। इस गंभीर जोखिम से बचने के लिए डॉक्टरों का कहना है कि मेनोपॉज से पहले ही सजग हो जाना चाहिए। महिलाओं को अपने रूटीन में एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर स्वस्थ आहार, रोजाना कम से कम 30 मिनट का नियमित व्यायाम, तनाव से दूरी और समय-समय पर अपने ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल व ग्लूकोज लेवल की मॉनिटरिंग करते रहना चाहिए। अगर लक्षण गंभीर हों, तो बिना देर किए डॉक्टर की सलाह पर जीवनशैली में सुधार के साथ उचित दवाओं का सहारा लेना ही सबसे सुरक्षित उपाय है।