नेहरू का रिकॉर्ड टूटते ही इतिहास पर बड़ी बहस, कभी जो 'ब्रेन ड्रेन' देश की बड़ी चिंता...
आज, 10 जून 2026 का दिन देश के इतिहास में एक सुनहरे पन्ने के रूप में हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो गया है। देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकतंत्र के इतिहास में सबसे लंबे समय तक लगातार सेवा करने वाले 'चुने हुए' प्रधानमंत्री के रूप में भारत के पहले पीएम पंडित जवाहरलाल नेहरू का ऐतिहासिक रिकॉर्ड पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। इस महा-रिकॉर्ड के बनते ही देश के बौद्धिक और कूटनीतिक गलियारों में नेहरू युग और मोदी युग की कार्यशैली को लेकर एक बेहद दिलचस्प तुलनात्मक बहस छिड़ गई है। इस लंबी राजनीतिक और रणनीतिक यात्रा में जो सबसे बड़ा ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिलता है, वो है- विदेश में रहने वाले भारतीय प्रवासियों (Indian Diaspora) को देखने का नजरिया। जो प्रतिभा पलायन यानी 'ब्रेन ड्रेन' कभी नेहरू काल में देश के लिए एक बहुत बड़ा सिरदर्द और संसाधन का नुकसान माना जाता था, वही आज मोदी युग में वैश्विक मंच पर भारत की सबसे घातक 'सॉफ्ट पावर' और रणनीतिक कूटनीति का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।
नेहरू युग की वो सबसे बड़ी कसक: जब सिफारिश न होने पर नोबेल विजेता डॉ. हरगोविंद खुराना को भारत में नहीं मिली थी नौकरी
आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में भारत के भीतर 'ब्रेन ड्रेन' का दर्द कितना गहरा और तकलीफदेह था, इसे महान वैज्ञानिक डॉ. हरगोविंद खुराना की एक सच्ची और भावुक कहानी से बेहद आसानी से समझा जा सकता है। अपनी उच्च शिक्षा पूरी कर जब डॉ. खुराना बड़े अरमानों के साथ स्वदेश लौटे, तो उन्होंने देश के कई प्रतिष्ठित संस्थानों में नौकरी के लिए आवेदन किया था। लेकिन लालफीताशाही का आलम यह था कि उन्हें एक साधारण कॉलेज में प्रोफेसर तक की नौकरी देने से सिर्फ इसलिए मना कर दिया गया क्योंकि उनके पास किसी बड़े नेता या रसूखदार व्यक्ति की 'सही सिफारिश' नहीं थी। इस भ्रष्ट सिस्टम से बेहद निराश होकर वे वापस विदेश चले गए और साल 1968 में उन्होंने जेनेटिक कोड की ऐतिहासिक व्याख्या के लिए चिकित्सा के क्षेत्र में पूरी दुनिया का सबसे बड़ा 'नोबेल पुरस्कार' जीतकर इतिहास रच दिया। जब यह खबर भारत पहुंची, तो यहां के नीति-निर्माताओं को अपनी उस भारी भूल का अहसास हुआ, जिसने देश की एक अनमोल बौद्धिक संपदा को हमेशा के लिए खो दिया था।
'उसी देश के प्रति वफादार रहें': जब नेहरू ने प्रवासियों को संकट के समय मदद देने से कर दिया था साफ इनकार
नेहरू काल में भारत की विदेश नीति पूरी तरह से गुटनिरपेक्षता और अहस्तक्षेप के सिद्धांतों पर टिकी हुई थी। प्रवासियों को लेकर उस दौर की सोच का एक बेहद मशहूर और ऐतिहासिक वाकया 1950 के दशक का है। उस समय पूर्वी अफ्रीका और मलाया (अब मलेशिया) में लाखों की तादाद में भारतीय मूल के लोग रह रहे थे, जो वहां के स्थानीय राजनीतिक और नस्लीय बदलावों के कारण खुद को बेहद असुरक्षित महसूस कर रहे थे। जब इन संकटग्रस्त प्रवासियों ने बड़ी उम्मीदों के साथ तत्कालीन भारत सरकार से कूटनीतिक हस्तक्षेप और सुरक्षा की गुहार लगाई, तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद के पटल से दो टूक शब्दों में कह दिया कि जो भारतीय दूसरे देशों की नागरिकता ले चुके हैं या वहां बस गए हैं, उन्हें अब उसी मेजबान देश के प्रति पूरी तरह वफादार होना चाहिए और वे भारत से किसी भी तरह की राजनीतिक या सैन्य सुरक्षा की उम्मीद कतई न रखें।
मोदी युग का महा-बदलाव: 'ब्रेन ड्रेन' की चिंता छोड़ 'ब्रेन गेन' को बनाया दुनिया का सबसे अचूक कूटनीतिक मॉडल
साल 2014 में देश की सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की पारंपरिक विदेश नीति को पूरी तरह से री-राइट (बदल) कर दिया। उन्होंने विदेशी धरती पर रह रहे भारतीयों को देश के लिए एक 'लायबिलिटी' या खोई हुई प्रतिभा मानने के बजाय, उन्हें भारत का सबसे बड़ा ग्लोबल 'रणनीतिक एसेट' घोषित किया। पीएम मोदी ने अपनी हर विदेश यात्रा के दौरान भारतीय प्रवासियों के साथ सीधे संवाद का एक ऐसा भव्य कूटनीतिक मॉडल तैयार किया, जिसने दुनिया के सुपरपावर देशों के राष्ट्रध्यक्षों को भी हैरान कर दिया। इन ऐतिहासिक आयोजनों ने पूरी दुनिया को यह कड़ा संदेश दिया कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारतीय समुदाय का वोट और रुतबा कितना ज्यादा मायने रखता है:
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मैडिसन स्क्वायर गार्डन, अमेरिका (2014): न्यूयॉर्क के इस ऐतिहासिक इनडोर एरिना में हुए भव्य शो ने दुनिया को पहली बार प्रवासी भारतीयों की असीम और संगठित राजनीतिक ताकत का लोहा मानने पर मजबूर किया।
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वेम्बली स्टेडियम, लंदन (2015): तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरून के साथ खचाखच भरे स्टेडियम में मंच साझा कर पीएम मोदी ने ब्रिटेन की घरेलू राजनीति में भारतीय वोटर्स के तगड़े प्रभाव को रेखांकित किया।
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हाउडी मोदी, ह्यूस्टन (2019): तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी में जब 50 हजार से अधिक भारतीयों ने भारत माता के जयकारे लगाए, तो वह वैश्विक कूटनीति का एक सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ।
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अहलान मोदी, यूएई (2024): खाड़ी देशों के बीच आयोजित इस ऐतिहासिक कार्यक्रम ने अरब जगत में काम करने वाले लाखों भारतीय कामगारों की ताकत और भारत-यूएई की अटूट दोस्ती पर एक नई मुहर लगा दी।
सुंदर पिचाई से लेकर सत्या नडेला तक टेक वर्ल्ड पर राज, रेमिटेंस के मामले में 120 बिलियन डॉलर पार कर रचा इतिहास
प्रवासी भारतीयों को एक अजेय वैश्विक ताकत बनाने के पीछे केवल ये भव्य और ऐतिहासिक आयोजन ही नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ा आर्थिक और तकनीकी आधार भी काम कर रहा है। विश्व बैंक (World Bank) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत आज पूरी दुनिया का इकलौता ऐसा देश बन चुका है जो विदेशों से भेजे जाने वाले धन यानी रेमिटेंस (Remittance) के मामले में 120 बिलियन डॉलर (लगभग 10 लाख करोड़ रुपये) के जादुई आंकड़े को पार कर चुका है। यह विशाल धनराशि सीधे तौर पर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिर रखने और देश की आंतरिक अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में सबसे बड़ा योगदान दे रही है। इसके साथ ही, गूगल के सुंदर पिचाई, माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला से लेकर आईबीएम और एडोब जैसी दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों के शीर्ष पदों पर बैठे भारतीय मूल के सीईओ आज पूरी वैश्विक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को दिशा दे रहे हैं। मोदी सरकार ने इस अभूतपूर्व ग्लोबल नेटवर्क का बखूबी इस्तेमाल कर देश में भारी विदेशी निवेश लाने और 'डिजिटल इंडिया' जैसे महा-अभियानों को पूरी दुनिया में सफल बनाने का काम किया है।