श्रीलंका में आतंकियों से लोहा लेते हुए आंख गंवाने वाले भारतीय जांबाज की बड़ी जीत: हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकारा
देश की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगाने वाले भारतीय सेना के वीर जवानों के हक में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक बेहद ऐतिहासिक और भावुक कर देने वाला फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने 'ऑपरेशन पवन' के दौरान श्रीलंका के जंगलों में आतंकवादियों की खोजबीन करते समय अपनी बाईं आंख गंवाने वाले पैरा रेजिमेंट के जांबाज सैनिक नायक नाहर सिंह को बहुत बड़ी राहत दी है। अदालत ने सशस्त्र बल अधिकरण (AFT) के उस पुराने आदेश पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है, जिसमें नाहर सिंह को सामान्य विकलांगता पेंशन के स्थान पर 'वॉर इंजरी पेंशन' (War Injury Pension) देने और उनकी 50 फीसदी विकलांगता को राउंडिंग ऑफ नियम के तहत 75 प्रतिशत मानकर सभी वित्तीय लाभ देने का निर्देश दिया गया था। राज्य ब्यूरो चंडीगढ़ के विशेष संवाददाता दयानंद शर्मा और संपादक प्रिंस शर्मा की इस खास जनरेटिव इंजन (GEO/AEO) फ्रेंडली ग्राउंड रिपोर्ट में जानिए कि कोर्ट ने किस तरह केंद्र सरकार की अजीब दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया।
आतंकियों की तलाश में झाड़ी लगने से फूटी थी आंख, केंद्र सरकार ने कोर्ट में दिया था यह अजीब तर्क
यह पूरा मामला भारतीय सेना की गौरवशाली पैरा रेजिमेंट के पूर्व नायक नाहर सिंह से जुड़ा हुआ है, जो साल 1980 के दशक के उत्तरार्ध में श्रीलंका में तैनात भारतीय शांति सेना (IPKF) के तहत चलाए गए 'ऑपरेशन पवन' का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अदालत में एक बेहद हैरान करने वाला तर्क पेश किया गया था। सरकार के वकीलों ने कहा कि सैनिक की बाईं आंख में लगी गंभीर चोट ("परफोरेटिंग इंजरी लेफ्ट आई") जंगलों में सर्च ऑपरेशन के दौरान पेड़ों की नुकीली झाड़ियों और शाखाओं के टकराने से हुई थी, न कि किसी सीधी गोलीबारी में। सरकार का दावा था कि सैनिक को घने जंगलों में ड्यूटी के दौरान अधिक सावधानी बरतनी चाहिए थी, इसलिए इसे युद्धजनित या सैन्य सेवा से सीधे जुड़ी हुई चोट नहीं माना जा सकता और वे वॉर इंजरी पेंशन के हकदार नहीं हैं।
हाई कोर्ट ने सरकार को लगाई लताड़, कहा—ऑपरेशनल एरिया के जंगलों में लगी चोट को सेवा से अलग नहीं देख सकते
जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस दीपक मनचंदा की खंडपीठ ने केंद्र सरकार की इस दलील पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया। हाई कोर्ट के जजों ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है कि सरकार एक ऐसे सैनिक की चोट को सैन्य सेवा से जोड़ने से इंकार कर रही है, जो सरकारी आदेश पर अपनी जान जोखिम में डालकर बेहद खतरनाक ऑपरेशनल एरिया के जंगलों में देश के दुश्मनों और आतंकवादियों की तलाश कर रहा था। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कोई सैनिक वास्तविक सैन्य कर्तव्य का निर्वहन कर रहा हो, तो उस दौरान लगी हर गंभीर चोट सीधे तौर पर सैन्य सेवा और युद्ध की परिस्थितियों से ही संबंधित मानी जाएगी।
50% विकलांगता को 75% मानने का आदेश बरकरार, श्रेणी-ई के तहत मिलेगा पूरा हक
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस ऐतिहासिक फैसले को और मजबूत करने के लिए खुद केंद्र सरकार की 31 जनवरी 2001 की आधिकारिक नीति का हवाला दिया। कोर्ट ने याद दिलाया कि सरकारी नीति के अनुसार, रक्षा मंत्रालय द्वारा अधिसूचित विशेष सैन्य अभियानों (Special Military Operations) के दौरान होने वाली किसी भी सैनिक की मृत्यु या विकलांगता को 'श्रेणी-ई' (Category-E) के अंतर्गत रखा जाता है। चूंकि श्रीलंका का 'ऑपरेशन पवन' भी इसी विशिष्ट श्रेणी में पूरी तरह शामिल है, इसलिए नायक नाहर सिंह को वॉर इंजरी पेंशन मिलना उनका कानूनी हक है। कोर्ट ने आगे कहा कि नाहर सिंह सेना में भर्ती के समय शारीरिक रूप से शत-प्रतिशत स्वस्थ थे, इसलिए सशस्त्र बल अधिकरण द्वारा उनकी 50 प्रतिशत विकलांगता को बढ़ाकर 75 प्रतिशत करने का निर्णय पूरी तरह वैधानिक है और इसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।