चतरा के लेंबोईया पहाड़ पर गिरा था मां सती का वाम नेत्र, मन्नत पूरी होते ही भक्त चढ़ाते हैं सोने-चांदी की आंखें
झारखंड के चतरा जिले अंतर्गत पत्थलगडा प्रखंड में स्थित सुरम्य लेंबोईया पहाड़ी की चोटी पर विराजमान मां दक्षिणेश्वरी भगवती का सिद्धपीठ सदियों से आस्था, चमत्कार और ऐतिहासिक धरोहर का अनोखा केंद्र बना हुआ है। प्राकृतिक छटा से आच्छादित इस पावन पहाड़ी पर स्थापित मंदिर की ख्याति झारखंड समेत पड़ोसी राज्यों में भी फैली है, जहां शारदीय नवरात्र के मौके पर माता के दर्शन व विशेष अनुष्ठान के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ता है।
स्थानीय जनश्रुति और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र पहाड़ी पर माता सती का वाम नेत्र (बांया नेत्र) गिरा था, जिस वजह से इस शक्तिपीठ का आध्यात्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है। यहां मां भगवती अपने उग्र और ममतामयी चामुंडा स्वरूप में दक्षिण दिशा की ओर मुख किए हुए विराजमान हैं, जिसे तंत्र और शास्त्र दोनों ही दृष्टियों से दुर्लभ व सर्वकल्याणकारी फल देने वाला माना जाता है।
लेंबोईया धाम में सदियों से चली आ रही लोक परंपराएं इसे देश के अन्य मंदिरों से अलग बनाती हैं। यहां मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और हैसियत के अनुसार माता के श्रीचरणों में सोने अथवा चांदी के नेत्र अर्पित करते हैं। इसके अलावा मंदिर में पूजा-अर्चना की एक और विस्मयकारी रीति प्रचलित है; पुजारी जब मां भगवती के पावन मस्तक पर पुष्प अर्पित कर स्तुति करते हैं, तब श्रद्धालु टकटकी लगाए उस फूल के गिरने की प्रतीक्षा करते हैं। जनविश्वास है कि मां के मस्तक से पुष्प जितनी तेजी से नीचे गिरता है, भक्त की मुराद उतनी ही शीघ्र पूरी होती है और इसे साक्षात भगवती के आशीर्वाद की पुष्टि माना जाता है।
सांस्कृतिक ताने-बाने की बात करें तो पहले यहां नवरात्र की नवमी को विशाल मेला लगता था, जो बाद में पत्थलगडा मुख्यालय में दुर्गा पूजा शुरू होने के बाद कार्तिक पूर्णिमा के वार्षिक मेले में तब्दील हो गया। मंदिर परिसर में स्थापित प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं अपने अंदर समृद्ध इतिहास समेटे हुए हैं, जिनका संबंध पाल राजवंश के स्वर्णिम काल से माना जाता है। स्थानीय ऐतिहासिक आख्यानों के मुताबिक, मुगल बादशाह औरंगजेब के दौर में सेनापति दाऊद खान द्वारा पलामू, कुंदा और कोठी किले पर किए गए हमलों के दौरान इस ऐतिहासिक स्थल को भी क्षति पहुंचाई गई थी। हालांकि, ब्रिटिश काल के वर्ष 1872 के राजस्व सर्वेक्षण मानचित्र में भी इस प्राचीन मंदिर का स्पष्ट अंकन मिलता है, जो इसकी प्राचीनता पर मुहर लगाता है।
मंदिर के वरिष्ठ पुजारी भोली पांडेय के अनुसार, इस सिद्धपीठ का रामगढ़ राजपरिवार से गहरा ऐतिहासिक नाता रहा है। राजा कामाख्या नारायण सिंह स्वयं यहां व्यवस्थाओं का जायजा लेने आते थे और मंदिर के रख-रखाव व पुरोहितों के जीवन-यापन के लिए सिंघानी और लेंबोईया मौजा में भूमि दान की थी।
आज भी यहां पहली बलि का पारंपरिक संकल्प रामगढ़ राजपरिवार के नाम से ही उच्चारित किया जाता है। इसके अतिरिक्त, स्थानीय भूमिहार समाज के लोग मां भगवती को अपनी कुलदेवी मानकर हर शुभ कार्य, मुंडन, उपनयन और विवाह से पूर्व आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। वहीं, आषाढ़ महीने में सिंघानी गांव के किसान विशेष पात्र में दूध अर्पित कर वर्षभर की कृषि पैदावार का पूर्व-अनुमान लगाते हैं। राज्य सरकार द्वारा पर्यटन स्थल के रूप में चिन्हित यह पहाड़ी अपने प्राकृतिक सौंदर्य, पुरातात्विक महत्व और जीवित आस्था के चलते आज भी चतरा की सांस्कृतिक धरोहर की अमिट पहचान बनी हुई है।