झुग्गी से UPSC तक! इस अफसर की कहानी पढ़कर आप भी कहेंगे- हौसला हो तो सब मुमकिन
कुछ सपने ऐसे होते हैं जिन्हें हालात बार-बार तोड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन अटूट हौसला हर बार उन्हें फिर से खड़ा कर देता है। भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी उम्मुल खेर की जीवन यात्रा भी ऐसे ही असाधारण संघर्ष, असहनीय शारीरिक दर्द और अटूट जिद की जीती-जागती मिसाल है। बचपन में झुग्गी-झोपड़ी में रहकर जीवन के कड़वे अभावों को बेहद करीब से देखने वाली उम्मुल के सामने चुनौतियां अंतहीन थीं।
गंभीर हड्डियों की बीमारी ने लंबे समय तक उन्हें बेड़ियों की तरह जकड़े रखा, लेकिन विपरीत परिस्थितियों के बीच भी उन्होंने किताबों और शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। अपने पहले ही प्रयास में प्रतिष्ठित यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पास करके उन्होंने साबित कर दिया कि मजबूत संकल्प के आगे कोई भी बाधा टिक नहीं सकती।
कांच जैसी नाजुक हड्डियां, प्लास्टर में बीता बचपन
उम्मुल खेर का बचपन किसी भीषण जंग से कम नहीं था। वह बताती हैं कि वे 'ऑस्टियोजेनेसिस इमपरफेक्टा' (Osteogenesis Imperfecta/Fragile Bone Disorder) नामक एक अत्यंत दुर्लभ बीमारी से पीड़ित थीं। इस बीमारी के कारण उनकी हड्डियां कांच की तरह कमजोर और नाजुक थीं, जो मामूली झटके से भी टूट जाती थीं।
इसी वजह से उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा बार-बार प्लास्टर बंधवाने और अस्पतालों के चक्कर काटने में बीता। असहनीय शारीरिक कष्ट के बावजूद उन्होंने अपनी सीमाओं को कभी पढ़ाई के आड़े नहीं आने दिया और पूरे समर्पण के साथ शिक्षा जारी रखी।
हजरत निजामुद्दीन की झुग्गी और ट्यूशन का सहारा
पारिवारिक आर्थिक स्थिति बेहद तंग होने की वजह से उम्मुल को अपने जीवन के कई साल देश की राजधानी दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन इलाके के पास स्थित एक झुग्गी बस्ती में गुजारने पड़े थे। परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों में हाथ बंटाने और अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए उन्होंने स्कूल के दिनों से ही दूसरे छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था। पैसों की भारी कमी ने उन्हें कभी कमजोर नहीं किया, बल्कि विपरीत परिस्थितियों से लड़ना और कड़ा परिश्रम करना सिखाया। इसी कठिन दौर ने उनकी सफलता की सबसे मजबूत नींव रखी।
10 साल तक पहनीं 'दर्दनाक बेड़ियां', नहीं टूटने दिया अनुशासन
चलने-फिरने की क्षमता बनाए रखने के लिए उम्मुल को करीब 10 सालों तक अपने पैरों में भारी और बेहद दर्दनाक प्लास्टिक ब्रेसेस (Braces) पहनने पड़े थे। वह इन ब्रेसेस को 'दर्दनाक बेड़ियां' कहती हैं, जो अक्सर उनकी कोमल त्वचा को छील देती थीं और असहनीय दर्द का कारण बनती थीं। इस भयानक शारीरिक पीड़ा के बावजूद उन्होंने कभी कॉलेज जाना नहीं छोड़ा और अपने दैनिक अनुशासन को टूटने नहीं दिया। यह शारीरिक तपस्या उनके अटूट मानसिक संकल्प को दर्शाती है।
क्लीनिकल साइकोलॉजी छोड़ JNU से की पढ़ाई, फेलोशिप से मिला संबल
यूपीएससी की लंबी तैयारी को साधने के लिए उम्मुल ने बेहद व्यावहारिक और दूरगामी फैसले लिए। पढ़ाई के भारी खर्च और समय को संतुलित रखने के लिए उन्होंने अपनी पसंदीदा क्लीनिकल साइकोलॉजी की जगह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से इंटरनेशनल स्टडीज को चुना। जेएनयू में अध्ययन के दौरान उन्होंने जूनियर रिसर्च फेलोशिप (JRF) हासिल की। इस फेलोशिप से मिलने वाली आर्थिक मदद ने उनकी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए जरूरी वित्तीय संबल प्रदान किया।
पहले ही प्रयास में UPSC क्रैक, बनीं 2017 बैच की IRS
उम्मुल खेर ने अपनी कड़ी मेहनत, अटूट धैर्य और अनुशासित दिनचर्या के बल पर अपने पहले ही प्रयास में यूपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण कर ली और 2017 बैच की इंडियन रेवेन्यू सर्विस (IRS) अधिकारी बनकर उभरीं। अपने संघर्ष भरे सफर के दौरान जब दक्षिण कोरिया में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए उन्हें वीजा नहीं मिला था, तब भी उनका हौसला नहीं डगमगाया था। उनकी यह गौरवशाली दास्तां हर यूपीएससी एस्पिरेंट के लिए यह संदेश देती है कि इंसान तब तक नहीं हारता जब तक वह खुद प्रयास करना बंद न कर दे।