CJP फाउंडर अभिजीत दिपके ने आशुतोष रांका और सौरव दास को लिखा कड़ा पत्र
मानवाधिकार और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में काम करने वाले चर्चित संगठन सिटिजंस फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने हाल ही में आशुतोष रांका और सौरव दास के नाम एक बेहद भावुक, कड़ा और विचारोत्तेजक पत्र जारी किया है। इस पत्र ने सामाजिक और कूटनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। अपने इस पत्र में अभिजीत दिपके ने संगठन के भीतर उठे विवादों, वैचारिक मतभेदों और अतीत में हुई गलतियों पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा है कि केवल एक औपचारिक माफी मांग लेने भर से बीती बातें और उनसे पहुंचे मानसिक व सामाजिक नुकसान आसान नहीं हो जाते। उन्होंने लिखा कि जब सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों पर आंच आती है, तो खोया हुआ भरोसा केवल शब्दों से वापस नहीं पाया जा सकता, बल्कि उसके लिए जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी है।
जानिए क्या है CJP फाउंडर अभिजीत दिपके के पत्र का पूरा मामला और इसके मायने
अभिजीत दिपके का यह पत्र ऐसे समय में सामने आया है जब मानवाधिकार संगठनों और डिजिटल एक्टिविज्म के मंचों पर आंतरिक पारदर्शिता और नेतृत्व के तौर-तरीकों को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे। पत्र में दिपके ने आशुतोष रांका और सौरव दास से जुड़े घटनाक्रम का सीधे तौर पर जिक्र किया है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि किसी भी बड़े मंच या संस्था को खड़ा करने में वर्षों की मेहनत और आम जनता का अटूट विश्वास लगता है, लेकिन आपसी खींचतान और गैर-जिम्मेदाराना बयानों के कारण वह विश्वास पल भर में डगमगा जाता है। दिपके ने पत्र में जोर देकर कहा कि यदि गलतियां इरादतन या प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही के कारण हुई हैं, तो महज एक माफीनामा उस प्रभाव को मिटा नहीं सकता जो पीड़ितों या संस्था से जुड़े कार्यकर्ताओं पर पड़ा है।
संस्थागत नैतिकता और जवाबदेही पर अभिजीत दिपके ने उठाए गंभीर सवाल
इस पत्र के माध्यम से CJP फाउंडर ने न केवल संबंधित व्यक्तियों को कटघरे में खड़ा किया है, बल्कि पूरे एक्टिविज्म और सिविल सोसाइटी के काम करने के तरीके पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने लिखा कि सामाजिक लड़ाई लड़ने वाले लोगों को समाज के सामने एक मिसाल कायम करनी होती है। जब हम दूसरों से जवाबदेही और न्याय की मांग करते हैं, तो हमें अपने भीतर भी उसी स्तर की ईमानदारी और पारदर्शिता रखनी होगी। उन्होंने आशुतोष रांका और सौरव दास को संबोधित करते हुए यह साफ कर दिया कि यदि वे सचमुच सुधार चाहते हैं, तो उन्हें केवल मौखिक या लिखित माफी तक सीमित रहने के बजाय अपनी कार्यशैली में ठोस बदलाव दिखाना होगा और उन नुकसानों की भरपाई के लिए व्यावहारिक कदम उठाने होंगे जो इस विवाद से उपजे हैं।
सामाजिक क्षेत्र और डिजिटल एक्टिविज्म पर इस विवाद का क्या पड़ेगा असर?
अभिजीत दिपके के इस पत्र के सार्वजनिक होने के बाद से ही सोशल मीडिया और सामाजिक संगठनों के बीच तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कई लोगों का मानना है कि दिपके का यह रुख संस्थागत सुधार और पारदर्शिता की दिशा में एक साहसिक कदम है, जिससे यह संदेश जाता है कि पद या कद कितना भी बड़ा क्यों न हो, कोई भी व्यक्ति नैतिकता से ऊपर नहीं है। वहीं कुछ विश्लेषकों का कहना है कि इस प्रकार के आंतरिक पत्रों और विवादों का सार्वजनिक होना सामाजिक न्याय के अभियानों को कमजोर कर सकता है। बहरहाल, अभिजीत दिपके का यह स्पष्ट रुख कि 'एक माफी सब कुछ ठीक नहीं कर सकती' अब सिविल सोसाइटी में एक मिसाल बन गया है, जो आने वाले दिनों में संगठन के भविष्य और इसके प्रमुख सदस्यों की भूमिका तय करने में अहम साबित होगा।