मुगल साम्राज्य के पतन और खूनी इतिहास का गवाह है दिल्ली का 'खूनी दरवाजा

मुगल साम्राज्य के पतन और खूनी इतिहास का गवाह है दिल्ली का 'खूनी दरवाजा

भारतीय इतिहास के पन्नों को जब भी पलटा जाता है, तो दिल्ली की हर एक ईंट और दीवार से कोई न कोई पुरानी दास्तान और संघर्ष की कहानी बाहर निकल कर आती है। देश की राजधानी दिल्ली में स्थित ऐतिहासिक स्मारकों में एक ऐसा नाम भी शामिल है जिसके नाम से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं और वह है 'खूनी दरवाजा' (Khooni Darwaza)। फिरोजशाह कोटला मैदान के पास स्थित यह ऐतिहासिक दरवाजा मुगलों के पतन और भारत के स्वतंत्रता संग्राम के पहले बड़े संघर्ष यानी 1857 की क्रांति के सबसे वीभत्स और खूनी अध्यायों का जीवंत गवाह रहा है। इसी स्थान पर मुगलिया सल्तनत के अंतिम चिराग कहे जाने वाले सम्राट बहादुर शाह जफर के शहजादों की सरेआम हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद से इस जगह का नाम इतिहास में हमेशा के लिए 'खूनी दरवाजा' दर्ज हो गया। आइए इस ऐतिहासिक धरोहर के वजूद, इसके खूनी इतिहास और इससे जुड़ी हर एक रोमांचक व दर्दनाक दास्तान को गहराई से समझते हैं।

दिल्ली के खूनी दरवाजे का निर्माण मूल रूप से लोदी वंश के शासनकाल में या उससे भी पहले शेरशाह सूरी या उसके आसपास के दौर में सुरक्षात्मक दीवारों के एक हिस्से के रूप में कराया गया था। यह दरवाजा दिल्ली के प्रसिद्ध ऐतिहासिक सात शहरों में से एक 'शेरगढ़' या शाहजहांनाबाद के प्रवेश मार्गों के नजदीक स्थित था। शुरुआत में इसे केवल एक सामान्य शाही गेटवे के रूप में जाना जाता था, जिसका उपयोग आवाजाही के लिए किया जाता था। हालांकि, मुगल काल के आते-आते और विशेषकर औरंगजेब तथा बाद के शासकों के दौर में इस जगह का इस्तेमाल राजनीतिक बंदियों को सजा देने, उनके शवों को लटकाने और विरोधियों में खौफ पैदा करने के लिए किया जाने लगा। इसी वजह से समय के साथ इसका नाम आम बोलचाल की भाषा में 'खूनी दरवाजा' पड़ गया क्योंकि यहां कई बड़े और दर्दनाक हत्याकांड अंजाम दिए गए थे।

इस दरवाजे के इतिहास का सबसे काला और वीभत्स दिन 22 सितंबर 1857 को आया, जब भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम अपने चरम पर था और ब्रिटिश सेना ने दिल्ली पर दोबारा कब्जा जमा लिया था। मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के बेटे मिर्जा मुगल, मिर्जा खिज्र सुल्तान और पोता मिर्जा अबू बकर ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। ब्रिटिश अधिकारी विलियम हडसन (William Hodson) के नेतृत्व में इन तीनों राजकुमारों को हुमायूं के मकबरे से गिरफ्तार करके खुले वाहन में लाया जा रहा था। जैसे ही काफिला इस दरवाजे के पास पहुंचा, विलियम हडसन ने निर्ममता की सारी हदें पार करते हुए तीनों राजकुमारों को उनके कपड़े उतरवाकर सरेआम गोली मार दी। इस घटना का मुख्य उद्देश्य मुगल वंश के बचे-खुचे रसूख और ताकत को पूरी तरह कुचलकर देशवासियों के दिलों में अंग्रेजों का खौफ बिठाना था।

केवल 1857 की क्रांति ही नहीं, बल्कि इस दरवाजे के दामन पर मुगलों के आपसी सत्ता संघर्ष के खून के धब्बे भी गहरे हैं। इतिहासकार बताते हैं कि मुगल बादशाह जहांगीर के आदेश पर उसके सौतेले भाई और दरबार के ताकतवर अमीर खुसरो मिर्जा या अन्य राजनीतिक विरोधियों को भी इसी जगह पर यातनाएं दी गईं और मौत के घाट उतारा गया था। इसके अलावा, औरंगजेब द्वारा अपने बड़े भाई दारा शिकोह को हराकर उसकी पराजय के बाद उसके शव को इसी दरवाजे पर अपमानित करने के लिए घुमाने और लटकाए जाने के किस्से भी इतिहास की किताबों में दर्ज हैं। यही कारण है कि यह स्थान दिल्ली के सत्ता संघर्ष, क्रूरता और साजिशों का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया, जहां राजाओं और शहजादों के खून से जमीन लाल होती रही।

आज के आधुनिक दौर में जब कोई पर्यटक या इतिहास प्रेमी आईटीओ और फिरोजशाह कोटला के पास से गुजरता है, तो उसे सड़क के बीचों-बीच यह पुराना लाल बलुआ पत्थर से बना ढांचा नजर आता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इसे एक संरक्षित राष्ट्रीय स्मारक के रूप में घोषित किया है, ताकि इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेज कर रखा जा सके। हालांकि, आज इस शांत और व्यस्त सड़क पर दौड़ती गाड़ियों के बीच वह पुराना खौफ और सन्नाटा तो नजर नहीं आता, लेकिन इसकी दीवारों में दबी चीखें और मुगलों के पतन की दास्तान आज भी देश के इतिहास प्रेमियों को झकझोर कर रख देती हैं। यह स्मारक हमें यह याद दिलाता है कि सत्ता की चाहत और युद्ध के मैदान में किस तरह अपनों का खून बहाया गया और कैसे एक महान साम्राज्य का अंत इस खूनी दरवाजे के साये में हुआ था।