बेटे की रील बनाते वक्त आप भी तो नहीं करतीं ये गलती, इस मां की तरह आप पर भी हो सकती है FIR?
आज के इस डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में हर माता-पिता अपने बच्चों के साथ खूबसूरत पलों को कैमरे में कैद करके इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब शॉर्ट्स पर रील (Reels) बनाना पसंद करते हैं। रातों-रात वायरल होने और लाइक्स-फॉलोअर्स बटोरने की इस अंधी दौड़ में लोग यह बिल्कुल भूल जाते हैं कि उनकी एक छोटी सी लापरवाही या इंटरनेट पर लोकप्रियता पाने की चाहत उन्हें सीधे कानून के शिकंजे में ला सकती है। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक ऐसा ही हैरान कर देने वाला मामला प्रकाश में आया है, जहां एक मां द्वारा अपने कम उम्र के बेटे के साथ बनाई गई एक विवादित रील इतनी भारी पड़ गई कि पुलिस ने उस महिला के खिलाफ गंभीर धाराओं में एफआईआर (FIR) दर्ज कर ली है। इस घटना के बाद से सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और वीडियो बनाने वाले अभिभावकों के बीच हड़कंप मच गया है, और यह बहस छिड़ गई है कि क्या बच्चों की प्राइवेसी और सुरक्षा ताक पर रखकर व्यूज बटोरना सही है।
आखिर क्या थी वह गंभीर गलती जो इस मां पर पड़ी भारी, पुलिस ने क्यों उठाया ऐसा सख्त कदम
सामने आई जानकारी के मुताबिक, इस वायरल वीडियो में एक मां अपने छोटे बेटे के साथ चलती सड़क या खतरनाक ट्रैफिक के बीच में खड़े होकर रील शूट कर रही थी, जिसमें बच्चा किसी खतरनाक स्टंट या ट्रैफिक नियमों की धज्जियां उड़ाने जैसी हरकत करता नजर आ रहा था। इतना ही नहीं, वीडियो में बच्चे की सुरक्षा को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया था और उसे अनुचित व संवेदनशील स्थिति में दिखाया गया था, ताकि वीडियो पर ज्यादा से ज्यादा व्यूज और कमेंट्स मिल सकें। जब यह वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैला, तो बाल अधिकारों की रक्षा करने वाले कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। पुलिस प्रशासन और साइबर सेल ने स्वतः संज्ञान लेते हुए बाल अधिकार संरक्षण कानून (Juvenile Justice Act) और अन्य प्रासंगिक धाराओं के तहत इस लापरवाह मां के खिलाफ कानूनी शिकंजा कसते हुए एफआईआर दर्ज कर ली।
बच्चों की प्राइवेसी, ऑनलाइन सुरक्षा और बाल अधिकार अधिनियम: कानून की नजर में क्या है सही और गलत
आज के समय में बच्चों को सोशल मीडिया पर एक्सपोज करना एक गंभीर वैश्विक चिंता का विषय बनता जा रहा है, जिसे 'शारेंटिंग' (Sharenting) यानी माता-पिता द्वारा बच्चों की हर गतिविधि को ऑनलाइन सार्वजनिक करना कहा जाता है। कानून विशेषज्ञों का साफ कहना है कि बच्चों के नाम पर या उनके साथ वीडियो बनाते समय यदि उनकी सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक भलाई को खतरे में डाला जाता है, तो यह सीधा-सीधा बाल अधिकारों का उल्लंघन माना जाता है। भारत में भी बाल संरक्षण आयोग (NCPCR) और साइबर कानून इस बात को लेकर बेहद सख्त हो गए हैं कि माता-पिता अपनी लोकप्रियता या आर्थिक फायदों के लिए बच्चों की मासूमियत का इस्तेमाल कमर्शियल या वायरल कंटेंट के रूप में नहीं कर सकते। यदि कोई अभिभावक ऐसा करता पाया जाता है, तो उसे जेल और भारी जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है।
लाइक्स और फॉलोअर्स की इस अंधी दौड़ में अपने बच्चों की सुरक्षा से कभी समझौता न करें
अक्सर देखा जाता है कि माता-पिता अपने बच्चों को ट्रेंडिंग गानों पर डांस करने, मिमिक्री करने या अजीबोगरीब हरकतें करने के लिए मजबूर करते हैं, ताकि उनकी बनाई गई रील इंटरनेट पर ट्रेंड कर सके। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि इंटरनेट की यह वर्चुअल दुनिया हमेशा सुरक्षित नहीं होती है। बच्चों के डिजिटल फुटप्रिंट्स (Digital Footprints) उनके भविष्य पर गहरा असर डालते हैं। स्कूल के दोस्तों, भविष्य के शिक्षकों और समाज की नजरों में इस तरह के वीडियो बच्चों के मानसिक विकास और आत्मसम्मान को ठेस पहुँचा सकते हैं। इसके अलावा, ऑनलाइन प्रीडेटर्स (Online Predators) और गलत नीयत वाले लोगों की नजर ऐसे बच्चों पर आसानी से पड़ जाती है। इसलिए, हर माता-पिता को यह समझना बेहद जरूरी है कि एक वायरल वीडियो या कुछ हजार लाइक्स आपके जिगर के टुकड़े की असली सुरक्षा और भविष्य से ज्यादा कीमती कभी नहीं हो सकते।
सोशल मीडिया यूजर्स और माता-पिता के लिए एक बड़ी सीख: जिम्मेदारी से निभाएं अभिभावक की भूमिका
इस सनसनीखेज मामले ने एक बार फिर से समाज के सामने यह आईना रख दिया है कि तकनीक और सोशल मीडिया का इस्तेमाल मनोरंजन के लिए होना चाहिए, न कि बच्चों के बचपन और सुरक्षा का सौदा करने के लिए। यदि आप भी अपने बच्चों के साथ रील या वीडियो बनाते हैं, तो हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि वीडियो में बच्चे की गरिमा, उसकी सहमति और उसकी शारीरिक सुरक्षा सुरक्षित हो। पुलिस और प्रशासन द्वारा की गई इस सख्त कार्रवाई से उन तमाम लोगों को कड़ा संदेश मिला है जो सिर्फ पब्लिसिटी और फॉलोअर्स बढ़ाने के चक्कर में कानून और नैतिकता की सीमाओं को लांघ जाते हैं। एक जिम्मेदार माता-पिता होने के नाते हमारी सबसे पहली प्राथमिकता हमारे बच्चों की सुरक्षा और उनका सुरक्षित भविष्य होनी चाहिए, न कि सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया में मिलने वाली झूठी वाहवाही।