भारत को प्रधानमंत्री चाहिए या अमेरिका जैसा राष्ट्रपति? इंदिरा से लेकर आडवाणी तक कर चुके अमेरिकी मॉडल अपनाने की मांग
भारत में लोकतंत्र की दिशा और दशा को लेकर समय-समय पर एक बहुत ही बुनियादी और गंभीर बहस छिड़ती रही है—क्या देश को मौजूदा संसदीय (Parliamentary) प्रणाली में ही आगे बढ़ना चाहिए, या फिर अमेरिका की तरह राष्ट्रपति (Presidential) शासन व्यवस्था अपना लेनी चाहिए? भारत की राजनीतिक यात्रा में यह सवाल केवल कानूनी विशेषज्ञों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सत्ता और विपक्ष के शीर्ष दिग्गजों ने भी इस पर अपनी मोहर लगाई है। आपातकाल के दौर में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के करीबी सहयोगियों ने राष्ट्रपति प्रणाली को अपनाने का खाका तैयार किया था, ताकि सरकार को अधिक स्थिरता दी जा सके। वहीं दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और कांग्रेस नेता शशि थरूर जैसे कई दिग्गज राजनेता भी भारत में गठबंधन सरकारों की अस्थिरता और विकास कार्यों की सुस्ती से निपटने के लिए अमेरिकी मॉडल की वकालत कर चुके हैं।
संसदीय बनाम राष्ट्रपति प्रणाली: देश की विविध संस्कृति, गठबंधन की मजबूरियां और भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती
संसदीय प्रणाली का मुख्य आकर्षण यह है कि इसमें कार्यपालिका (Executive) सीधे विधायिका (Legislature) के प्रति जवाबदेह होती है। भारत जैसे विशाल और सांस्कृतिक विविधता वाले देश में, जहाँ हर राज्य की भाषा, जाति और क्षेत्रीय मुद्दे अलग हैं, संसदीय मॉडल हर वर्ग और क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों को दिल्ली की सत्ता में अपनी हिस्सेदारी दर्ज कराने का अवसर देता है। इसके विपरीत, समर्थकों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति प्रणाली से देश को एक स्थिर नेतृत्व मिलता है। राष्ट्रपति के पास एक निश्चित कार्यकाल होता है, जिससे वह राजनीतिक दबावों, सहयोगी दलों की ब्लैकमेलिंग और बार-बार होने वाले चुनावों की चिंता किए बिना स्वतंत्र रूप से देश के विकास के लिए बड़े निर्णय ले सकता है।
हालांकि, इस प्रणाली के विरोधियों और संविधान विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत की बहुलतावादी विविधता में राष्ट्रपति मॉडल तानाशाही या सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण का कारण बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (केशवानंद भारती केस) के तहत संसदीय लोकतंत्र को भारतीय संविधान के ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) का हिस्सा माना गया है, जिसे बदलना लगभग असंभव है। लेकिन जैसे-जैसे भारत वैश्विक मंच पर एक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है और त्वरित फैसलों की आवश्यकता बढ़ रही है, 'प्रधानमंत्री बनाम राष्ट्रपति' की यह बहस भारतीय मीडिया, राजनीतिक चौपालों और थिंक टैंकों के बीच एक बार फिर गरमाने लगी है।