शहजाद पूनावाला के नाम का पूरा सच! ‘पूनावाला’ सरनेम कैसे बना, खुद किया खुलासा

शहजाद पूनावाला के नाम का पूरा सच! ‘पूनावाला’ सरनेम कैसे बना, खुद किया खुलासा

सक्रिय राजनीति के गलियारों से विदा लेने के बाद भी शहजाद अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बेहद सक्रिय हैं। वे आज भी आम नागरिकों और नौकरीपेशा मध्यम वर्ग के बुनियादी मसलों पर बेबाकी से राय रख रहे हैं। मुख्यधारा की राजनीति को त्यागते वक्त उन्होंने कॉरपोरेट या निजी क्षेत्र में काम करने की इच्छा जताई थी। उनका कहना था कि परिस्थितिवश वे सक्रिय भूमिका से पीछे हट रहे हैं लेकिन वे अपनी मूल वैचारिक सोच से अलग नहीं हुए हैं। इसी बीच उनके पारिवारिक उपनाम से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य भी लोगों के बीच ध्यान खींच रहा है जिसका जिक्र वे पहले कर चुके हैं।

क्या है असली पारिवारिक पहचान?

साल 2023 के मध्य में डिजिटल मंच मोजो स्टोरी पर बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी पहचान से जुड़े अनसुने पहलू साझा किए थे। उन्होंने स्पष्ट किया था कि उनका ताल्लुक शिया खानीस समुदाय से है। उनके खानदान की असली पहचान और उपनाम 'जमादार' रहा है। उनके पिता और चाचा पहले इसी पारिवारिक नाम का इस्तेमाल करते थे। जब उनके पिता ने मात्र 20 से 22 वर्ष की आयु में वाणिज्यिक गतिविधियों में कदम रखा तब उन्होंने व्यवसाय की सहूलियत को देखते हुए अपने नाम के आगे 'पूनावाला' जोड़ लिया। महाराष्ट्र के पुणे क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियों और शहर के नाम पर उपनाम चुनने का चलन काफी पुराना रहा है।

सत्ताधारी दल से विदाई क्यों

शहजाद ने अगस्त के महीने में पार्टी नेतृत्व को भेजे गए त्यागपत्र की प्रति सार्वजनिक की थी। उन्होंने 30 जुलाई को संगठन प्रमुख नितिन नवीन को पत्र प्रेषित कर सभी दायित्वों और प्राथमिक सदस्यता से पूरी तरह मुक्त होने का निवेदन किया था। अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट लिखा कि वे घरेलू आर्थिक संकटों और निजी वजहों के चलते अब कॉरपोरेट दुनिया का रुख कर रहे हैं। यद्यपि वे दल के नियमित ढांचे से दूर हो चुके हैं फिर भी वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन और नीतियों का हमेशा समर्थन करते रहेंगे।

गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि से राष्ट्रीय प्रवक्ता तक का सफर

उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए रेखांकित किया कि एक साधारण गैर-सियासी पृष्ठभूमि और पसमांदा मुस्लिम तबके से ताल्लुक रखते हुए उन्हें जो अवसर मिला वह बेहद दुर्लभ है। कांग्रेस का दामन छोड़ने के बाद उन्होंने दिसंबर 2017 में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की थी और बाद में राष्ट्रीय प्रवक्ता जैसी अहम जिम्मेदारी संभाली। अपने अंतिम फैसले को दोहराते हुए उन्होंने पत्र में यह भी जिक्र किया था कि दल के कुछ घटनाक्रमों और आंतरिक परिस्थितियों ने उन्हें सक्रिय राजनीति को अलविदा कहने के अपने निर्णय पर अटल रहने के लिए बाध्य किया।