57 बार टली सुनवाई, आस में थम गईं सांसें: 78,000 की कैंसर दवा को सस्ता कराने कोर्ट पहुंची महिला की दर्दनाक मौत

57 बार टली सुनवाई, आस में थम गईं सांसें: 78,000 की कैंसर दवा को सस्ता कराने कोर्ट पहुंची महिला की दर्दनाक मौत

कैंसर दुनिया की सबसे खौफनाक और जानलेवा बीमारियों में से एक है, जहां मरीज के लिए हर एक दिन और जीवन रक्षक (Life-Saver) दवा का मिलना बेहद कीमती होता है। मगर जब इलाज की लागत आम आदमी की पहुंच से बाहर हो और उससे जुड़ा मामला देश की न्याय प्रणाली की सुस्त रफ्तार में उलझ जाए, तो इसका अंजाम कितना दर्दनाक हो सकता है, इसकी बानगी केरल हाईकोर्ट से सामने आई है। यहां ब्रेस्ट कैंसर की एक जीवन रक्षक दवा 'रिबोसिक्लिब' (Ribociclib) को सस्ती दरों पर उपलब्ध कराने की जंग लड़ रही एक महिला याचिकाकर्ता की आखिरी सुनवाई के इंतजार में मौत हो गई।

57 बार टली सुनवाई 

यह कानूनी लड़ाई जून 2022 में केरल हाईकोर्ट में शुरू हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य कैंसर की बेहद महंगी दवाओं को आम भारतीय मरीजों के लिए किफायती और सुलभ बनाना था। जनवरी 2023 से लेकर अब तक इस बेहद संवेदनशील और जरूरी मामले को अदालत में अंतिम सुनवाई के लिए रिकॉर्ड 57 बार सूचीबद्ध (List) किया गया। मगर अफसोस, किसी भी तारीख पर इस पर अंतिम बहस पूरी नहीं हो सकी। 

इसी अंतहीन इंतजार के बीच याचिकाकर्ता महिला जिंदगी की जंग हार गई। हालांकि, मामले की गंभीरता को देखते हुए केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह जनहित से जुड़ा एक व्यापक मुद्दा है, इसलिए याचिकाकर्ता की मृत्यु के बाद भी अदालत इस पर अपनी तरफ से सुनवाई जारी रखेगी। अब इस मामले को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से सर्वोच्च स्तर पर जल्द सुनवाई सुनिश्चित करने की गुहार लगाई गई है।

जेनेरिक दवा से 95% तक कम हो सकती थीं कीमतें: जानिए क्या थी मांग?

महिला ने अपनी याचिका में केंद्र सरकार से बेहद महत्वपूर्ण 'पेटेंट अधिनियम की धारा 100' के तहत गवर्नमेंट यूज लाइसेंस (Government Use License) जारी करने की मांग की थी।

मौजूदा स्थिति: भारत में इस समय रिबोसिक्लिब दवा की मासिक लागत करीब 78,400 है, वहीं एक अन्य कैंसर दवा एबेमासिक्लिब की कीमत ₹47,700 से लेकर ₹95,500 प्रति माह तक जाती है।

लाइसेंस का फायदा: अगर सरकार यह विशेष लाइसेंस जारी कर देती, तो भारत में इस दवा का 'जेनेरिक संस्करण' तैयार करने का रास्ता साफ हो जाता। इससे दवा की कीमतों में सीधे 90 से 95 फीसदी तक की भारी गिरावट आती और यह महज कुछ हजार रुपये में मरीजों को मिलने लगती।

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