अस्पताल नहीं, उत्तर कोरिया की जेल थी वो; 26 दिन की भूख हड़ताल के बाद सोनम वांगचुक का बड़ा हमला
लद्दाख को छठी अनुसूची और संवैधानिक सुरक्षा देने की मांग को लेकर 26 दिनों तक भूख हड़ताल पर रहे प्रसिद्ध वैज्ञानिक सोनम वांगचुक ने अपना अनशन समाप्त करने के फैसले पर सवाल उठाने वालों को करारा जवाब दिया है। दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद अपने 24 मिनट के वीडियो संदेश में वांगचुक ने अस्पताल में बिताए दिनों की तुलना "उत्तर कोरिया" से करते हुए आरोप लगाया कि उन्हें एक तरह से नजरबंद या जेल में रखा गया था, जहां समर्थकों और आम लोगों से बात करने की बिल्कुल भी आजादी नहीं थी।
'अस्पताल नहीं, उत्तर कोरिया जैसी जेल में था'
अस्पताल के आईसीयू (ICU) के दिनों को याद करते हुए सोनम वांगचुक ने कहा कि सफदरजंग अस्पताल में उनके साथ कैदियों जैसा व्यवहार किया गया। उन्हें कमरे से बाहर निकलने की सख्त मनाही थी और सिर्फ तीन करीबियों को ही मिलने की इजाजत थी।
वीडियो संदेश में वांगचुक ने कहा, "वह कोई अस्पताल नहीं था, बल्कि मेरे लिए जेल जैसा था। मुझे मोबाइल फोन या लैपटॉप तक इस्तेमाल नहीं करने दिया गया। स्थिति यह थी कि मुझे अपने संदेश रुमालों (Handkerchiefs) पर लिखकर बाहर भेजने पड़ते थे। लद्दाख से आए मेरे सहयोगियों तक को मिलने नहीं दिया गया। हमारा देश उस अस्पताल के भीतर उत्तर कोरिया की तरह काम कर रहा था।"
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर रुख किया साफ
NEET विवाद के दौरान शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर हो रही आलोचनाओं का जवाब देते हुए वांगचुक ने स्पष्ट किया कि मंत्री को पद से हटाना कभी भी उनकी मुख्य प्राथमिकता नहीं थी। उन्होंने बताया कि सरकार कार्रवाई न करके पहले ही बहुत बड़ी राजनीतिक कीमत चुका रही है और जनआक्रोश का सामना कर रही है।
वांगचुक ने कहा, "मुझे व्यक्तिगत रूप से शिक्षा मंत्री का तुरंत इस्तीफा लेना आवश्यक नहीं लगा। केंद्रीय मंत्रियों के साथ वार्ता के दौरान मैंने यह मुद्दा उठाया था, लेकिन सरकार ने इस पर फैसला लेने के लिए अतिरिक्त समय मांगा और तुरंत कोई प्रतिबद्धता जताने से इनकार कर दिया।"
'खुद-ब-खुद सुलझ जाएगा इस्तीफे का मुद्दा'
भूख हड़ताल वापस लेने के अपने फैसले का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें पूरा भरोसा है कि राजनीतिक दबाव के कारण इस्तीफे की बात देर-सवेर अपने आप सिरे चढ़ेगी।
उन्होंने तर्क दिया, "मुझे पता था कि वे इस जिद्द के साथ ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाएंगे। जब नुकसान खुद सरकार का हो रहा है, तो इस्तीफे का मामला जल्दी ही सुलझ जाएगा। यही वजह थी कि मैंने इस एक बात पर बहुत अधिक दबाव नहीं बनाया, क्योंकि सरकार की प्रतिष्ठा पूरे देश में धूमिल हो रही है और जनता में नाराजगी साफ दिख रही है।"
'छात्रों की सुरक्षा और कानूनी राहत मेरी पहली प्राथमिकता'
अनशन खत्म करने के मुख्य कारणों का उल्लेख करते हुए सोनम वांगचुक ने कहा कि उनका पूरा ध्यान आंदोलन में शामिल युवाओं और छात्रों के भविष्य की रक्षा करना था।
उन्होंने जोर देकर कहा, "मेरी सबसे बड़ी चिंता प्रदर्शनकारी छात्रों को कानूनी सहायता पहुंचाना और उन पर दर्ज एफआईआर (FIR) से राहत दिलाना था। मेरा मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि किसी भी छात्र का भविष्य खराब न हो। मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर जनांदोलन आगे भी जारी रहेगा।"
बता दें कि सोनम वांगचुक ने गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में अपनी पत्नी गीतांजलि आंगमो तथा केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह की उपस्थिति में अपना 26 दिनों से जारी अनशन आधिकारिक रूप से समाप्त किया था।