दवाएं सस्ती करना काफी नहीं, भारत में गैर जरूरी दवाएं लिखने
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को हर नागरिक की पहुंच में लाने के लिए सरकारें लगातार प्रयासरत हैं। जन औषधि केंद्रों का विस्तार, आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (NLEM) के तहत कीमतों पर नियंत्रण और जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देने जैसे कदम निस्संदेह प्रशंसनीय हैं। लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि केवल दवाओं के दाम कम कर देने भर से मरीजों की जेब पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ कम नहीं होने वाला। देश के चिकित्सा क्षेत्र में एक गहरी और गंभीर समस्या जड़ जमा चुकी है—बिना किसी ठोस चिकित्सीय आवश्यकता के ढेर सारी दवाएं लिख देना (Polypharmacy) और अनावश्यक लैब जांचों का अंबार खड़ा कर देना। जब तक देश की हेल्थकेयर प्रणाली में 'ओवर-ट्रीटमेंट' और 'ओवर-डायग्नोसिस' की इस बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया जाएगा, तब तक स्वास्थ्य सुधारों का वास्तविक लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच पाएगा।
क्यों बढ़ रही है ओवर-मेडिकेशन और गैर-जरूरी लैब टेस्ट कराने की प्रवृत्ति?
चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में ओवर-मेडिकेशन के पीछे एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र काम कर रहा है। सामान्य सर्दी-जुकाम, वायरल बुखार या पेट की हल्की खराबी में भी मरीजों को एंटासिड, एंटीबायोटिक्स और मल्टीविटामिन्स के भारी भरकम प्रिस्क्रिप्शन थमा दिए जाते हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण 'डिफेंसिव मेडिसिन' (Defensive Medicine) यानी किसी भी कानूनी या मेडिकल जोखिम से बचने की डॉक्टरों की मानसिकता है। इसके अलावा, फार्मास्युटिकल कंपनियों की ओर से मिलने वाले प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन, निजी पैथोलॉजी लैब्स के साथ कमिशन मॉडल और कॉरपोरेट अस्पतालों द्वारा तय किए गए रेवेन्यू टारगेट भी डॉक्टरों को अधिक से अधिक जांचें और महंगी दवाएं लिखने पर मजबूर करते हैं। वहीं, मरीजों की यह मानसिकता भी जिम्मेदार है कि जब तक डॉक्टर 4-5 गोलियां न लिखे या खून की जांच न कराए, तब तक इलाज अधूरा माना जाता है।
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और आर्थिक तबाही: इस प्रैक्टिस का घातक सामाजिक असर
जरूरत से ज्यादा दवाएं और अनावश्यक जांचें केवल मरीज की जेब ही नहीं ढीली करतीं, बल्कि उनके शारीरिक स्वास्थ्य पर भी जानलेवा असर डालती हैं। बिना जरूरत एंटीबायोटिक्स का अंधाधुंध सेवन भारत में 'एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस' (AMR) का सबसे बड़ा कारण बन चुका है, जिससे आने वाले समय में मामूली संक्रमण का इलाज करना भी नामुमकिन हो जाएगा। इसके साथ ही, लगातार पैथोलॉजिकल और रेडियोलॉजिकल टेस्ट कराने से मरीजों में मानसिक तनाव और डर का माहौल बनता है। आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो भारत में आज भी आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर (OPE) यानी अपनी जेब से इलाज पर खर्च होने वाला पैसा बहुत अधिक है। लाखों परिवार हर साल केवल अनावश्यक दवाओं और महंगी जांचों के खर्च के कारण गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं।
भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही और कठोर स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट गाइडलाइंस की जरूरत
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए भारत को अपनी मेडिकल प्रैक्टिस में बड़े नीतिगत बदलाव करने होंगे। केवल दवाएं सस्ती करने के बजाय 'स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट गाइडलाइंस' (STG) को देश के हर सरकारी और निजी अस्पताल में सख्त तरीके से लागू करना होगा। मेडिकल ऑडिट की एक पारदर्शी प्रणाली तैयार करनी होगी जो यह ट्रैक करे कि किसी बीमारी विशेष के लिए लिखे गए टेस्ट और दवाएं मेडिकल गाइडलाइन्स के अनुरूप हैं या नहीं। इसके साथ ही, डॉक्टरों के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के एथिकल कोड को सख्ती से लागू करना और 'चूजिंग वाइजली' (Choosing Wisely) जैसे वैश्विक अभियानों को अपनाना जरूरी है, जो कम-मूल्य वाली या गैर-जरूरी चिकित्सीय प्रक्रियाओं को रोकने पर बल देते हैं। जब तक मेडिकल एथिक्स और मरीजों की सुरक्षा को मुनाफे से ऊपर नहीं रखा जाएगा, तब तक सस्ती दवाओं का लाभ अधूरा ही रहेगा।