सजा की कम दर और फर्जी मामलों में करोड़ों के मुआवजे पर उठे गंभीर सवाल

सजा की कम दर और फर्जी मामलों में करोड़ों के मुआवजे पर उठे गंभीर सवाल

भारतीय न्याय व्यवस्था और कानूनी प्रावधानों के गलियारों में एक बार फिर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी SC/ST Act को लेकर एक बहुत बड़ी बहस छिड़ गई है। देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में एक नई जनहित याचिका या विशेष याचिका दायर की गई है, जिसमें इस कानून के क्रियान्वयन, इसके दुरुपयोग और इससे जुड़े आंकड़ों पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। याचिका में मुख्य रूप से यह मुद्दा उठाया गया है कि इस अधिनियम के तहत अदालतों में सजा की दर (Conviction Rate) बेहद कम है, जबकि दूसरी तरफ फर्जी मामलों और झूठी शिकायतों के आधार पर निर्दोष लोगों को प्रताड़ित करने के साथ-साथ करोड़ों रुपये का मुआवजा बांटे जाने का सिलसिला चल रहा है। इस संवेदनशील और ज्वलनशील कानूनी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के रुख ने एक बार फिर पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। आइए इस याचिका में उठाए गए तमाम बिंदुओं और कानूनी पहलुओं को विस्तार से समझते हैं।

याचिकाकर्ताओं और कानूनी विश्लेषकों द्वारा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज होने वाले कुल मुकदमों में से सजा होने का प्रतिशत यानी कनविक्शन रेट काफी निराशाजनक रूप से कम है। कई मामलों में लंबी कानूनी प्रक्रिया, सबूतों के अभाव या फिर आपसी समझौतों के कारण अदालतें आरोपियों को बरी कर देती हैं। आलोचकों और याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जब बड़ी संख्या में मामले अदालतों में साबित नहीं हो पाते और लोग बरी हो जाते हैं, तो इससे यह सवाल खड़ा होता है कि क्या इस कानून की मूल भावना का सही इस्तेमाल हो रहा है या फिर इसका उपयोग निजी स्कोर सेट करने के लिए किया जा रहा है। न्याय प्रणाली के जानकारों का मानना है कि सजा की कम दर इस बात का संकेत है कि जमीनी स्तर पर इस कानून की प्रक्रिया में कई प्रकार की खामियां मौजूद हैं जिन्हें दूर किया जाना बेहद आवश्यक है।

इस नई याचिका का सबसे संवेदनशील और बड़ा पहलू फर्जी मामलों (False Cases) से जुड़ा हुआ है। याचिका में यह गंभीर आरोप लगाया गया है कि कई मामलों में व्यक्तिगत दुश्मनी, संपत्ति विवाद, जमीनी रंजिश या आपसी द्वेष के चलते एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों का दुरुपयोग किया जाता है। चूंकि इस कानून के तहत प्राथमिक सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज होते ही गिरफ्तारी के कड़े प्रावधान और त्वरित कानूनी प्रक्रिया सक्रिय हो जाती है, इसलिए इसका फायदा उठाकर कई बार निर्दोष लोगों और सरकारी अधिकारियों को भी फंसा दिया जाता है। जब तक पुलिस गहन जांच के बाद सच्चाई तक पहुंचती है, तब तक आरोपी व्यक्ति को मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से भारी प्रताड़ना का सामना करना पड़ चुका होता है। इस तरह की घटनाओं ने समाज के एक वर्ग में गहरी चिंता पैदा कर दी है।

याचिका में एससी/एसटी एक्ट के तहत मिलने वाले आर्थिक मुआवजे (Compensation) की व्यवस्था पर भी गहरी आपत्ति जताई गई है। नियमों के मुताबिक, इस अधिनियम के तहत मामला दर्ज होते ही पीड़ित पक्ष को राज्य सरकार की ओर से शुरुआती राहत और मुआवजा राशि तुरंत जारी कर दी जाती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जब तक मामला अदालत में साबित नहीं होता और आरोपी दोषी करार नहीं दिया जाता, तब तक शुरुआती चरण में ही भारी-भरकम मुआवजा राशि बांट दिए जाने के कारण कई लोग वित्तीय लाभ उठाने के लिए झूठे मुकदमे दर्ज कराने के लिए प्रेरित होते हैं। सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये इस तरह के मामलों में मुआवजे के रूप में खर्च हो रहे हैं, जबकि अंत में अदालत से कई लोग बेकसूर साबित होकर बाहर आते हैं। याचिका में मांग की गई है कि मुआवजे के वितरण की नीति की नए सिरे से समीक्षा की जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस याचिका पर विचार किए जाने और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए जाने के बाद से न्यायिक और राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी तेज हो गई है। अदालत यह देखेगी कि क्या वास्तव में इस कानून के प्रावधानों में ऐसे सुरक्षा चक्र जोड़े जाने की जरूरत है जिससे कि दलितों और शोषितों को अत्याचार से पूरा संरक्षण भी मिलता रहे और साथ ही किसी भी निर्दोष व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन या उसका फर्जी उत्पीड़न न हो सके। देश के न्यायविदों का मानना है कि सामाजिक न्याय और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बिठाना ही इस मामले का असली उद्देश्य होना चाहिए। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई से यह तय होगा कि क्या भारत के इस कड़े कानून में आने वाले समय में कोई बड़ा संशोधन या दिशा-निर्देश जारी किया जाता है या नहीं।