img

Up kiran,Digital Desk : अमेरिका और रूस के बीच दशकों से चली आ रही परमाणु हथियार नियंत्रण की सबसे अहम संधि ‘न्यू स्टार्ट’ अब समाप्त हो चुकी है। इसके साथ ही दुनिया के दो सबसे बड़े परमाणु हथियार भंडारों पर कोई कानूनी रोक नहीं बची है, जिससे वैश्विक सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं बढ़ गई हैं।

रूस की ओर से इस समझौते के खत्म होने पर अफसोस जताया गया है। क्रेमलिन का कहना है कि यह कदम दुर्भाग्यपूर्ण है और इससे रणनीतिक स्थिरता को नुकसान पहुंच सकता है। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि वे पुरानी शर्तों वाली संधि को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं। उनका मानना है कि अब एक नई, आधुनिक और व्यापक परमाणु संधि की जरूरत है।

ट्रंप का जोर इस बात पर है कि किसी भी नई संधि में चीन को भी शामिल किया जाना चाहिए। हालांकि बीजिंग पहले ही इस प्रस्ताव को खारिज कर चुका है। चीन का कहना है कि उसका परमाणु शस्त्रागार अमेरिका और रूस की तुलना में काफी छोटा है, इसलिए उस पर समान शर्तें लागू करना तर्कसंगत नहीं होगा।

पिछले साल रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने संकेत दिया था कि यदि अमेरिका सहमत हो तो रूस एक साल तक न्यू स्टार्ट की सीमाओं का पालन करने को तैयार है, लेकिन इस प्रस्ताव पर वॉशिंगटन की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं आई।

क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि रूस परमाणु स्थिरता को लेकर जिम्मेदार रुख अपनाए रखेगा और अगर अमेरिका की ओर से सकारात्मक संकेत मिलते हैं तो बातचीत के लिए दरवाजे खुले हैं। उन्होंने यह भी दोहराया कि यदि भविष्य में व्यापक परमाणु समझौते की बात होती है, तो उसमें नाटो देशों फ्रांस और ब्रिटेन को भी शामिल किया जाना चाहिए।

हथियार नियंत्रण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि न्यू स्टार्ट के खत्म होने से अमेरिका, रूस और चीन के बीच एक नई और खतरनाक परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हो सकती है। यह स्थिति न सिर्फ इन देशों के लिए बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।