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Up Kiran, Digital Desk:  बिहार की राजनीति में वंशवाद कोई नई बात नहीं, लेकिन इस बार के विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ी से उभरा है। मैदान में उतरने वाले कई उम्मीदवार सीधे-सीधे किसी दिग्गज नेता के बेटे, बेटी, पत्नी या अन्य करीबी रिश्तेदार हैं। इससे न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि आम कार्यकर्ता की भूमिका भी धीरे-धीरे सिमटती जा रही है।

राजनीतिक वारिसों की लंबी फेहरिस्त

राष्ट्रीय जनता दल के सबसे चर्चित चेहरे तेजस्वी यादव राघोपुर सीट से फिर से किस्मत आजमा रहे हैं। उनके पिता और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव का सियासी रसूख अभी भी पार्टी के फैसलों में झलकता है।

भाजपा ने भी पीछे नहीं हटते हुए पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी के बेटे सम्राट चौधरी को टिकट दिया है। इसी तरह, दिवंगत नेता और पूर्व बाहुबली शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब को भी राजद ने रघुनाथपुर से उतारा है।

सियासी सफर में पत्नियाँ, बेटियाँ और बहुएँ भी शामिल

रालोसपा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी स्नेहलता, भाजपा के वरिष्ठ नेता जगन्नाथ मिश्रा के बेटे नीतीश मिश्रा, और जीतन राम मांझी की बहू दीपा मांझी — इन नामों से यह स्पष्ट है कि सियासत में अब परिवार की भागीदारी एक आम चलन बन चुकी है।

जदयू की ओर से कोमल सिंह, लवली आनंद के बेटे चेतन आनंद, और शिवानंद तिवारी के बेटे राहुल तिवारी भी मैदान में हैं। भाजपा के नितिन नवीन बांकीपुर से ताल ठोक रहे हैं, जबकि संजीव चौरसिया दीघा से किस्मत आजमाएंगे।

राजनेताओं की पत्नियाँ और विधवाएँ भी सियासी मैदान में

भाजपा नेता विशेश्वर ओझा के बेटे राकेश ओझा, पूर्व सांसद सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी, और मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला जैसी हस्तियाँ भी अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों से ताल ठोक रही हैं।

कांग्रेस की ओर से पूर्व सांसद विजय कुमार के बेटे ऋषि मिश्रा को टिकट मिला है।

विशेषज्ञों की चिंता: क्या लोकतंत्र की नींव कमजोर हो रही है?

पटना स्थित AN Sinha Institute of Social Studies के अर्थशास्त्री विद्यार्थी विकास ने इस ट्रेंड पर गंभीर चिंता जताई है। उनका मानना है कि अब पार्टियाँ विचारधारा या जनहित के बजाय संबंधों और रसूख पर दांव लगाने लगी हैं। वे कहते हैं, “राजनीतिक दल अब वैचारिक प्रतिबद्धता से ज़्यादा पारिवारिक बैकग्राउंड देख रहे हैं। बिहार की शिक्षा व्यवस्था और कम जागरूकता इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा देती है।”

राज्य के जातिगत आंकड़ों के अनुसार, महज़ 14.71% आबादी ही 10वीं तक की शिक्षा प्राप्त कर पाई है, जो इस स्थिति की जड़ में एक बड़ी वजह मानी जा रही है।

कार्यकर्ताओं की राह कठिन, ग्लैमर और पैसा बना बाधा

राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी का कहना है कि आज एक साधारण कार्यकर्ता के लिए चुनाव लड़ना लगभग असंभव हो गया है। “ग्लैमर, पैसा और पहचान जब राजनीति के केंद्र में आ जाएं, तो समर्पित कार्यकर्ता पीछे छूट जाते हैं,” वे कहते हैं।