राजस्थान में 'गांव की सरकार' का रण: 16 जिलों की 586 सीटों पर 22 अक्टूबर को वोटिंग, दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर

राजस्थान में 'गांव की सरकार' का रण: 16 जिलों की 586 सीटों पर 22 अक्टूबर को वोटिंग, दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर

राजस्थान में ग्रामीण सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए सियासी जंग तेज हो गई है। पहले चरण के तहत 22 अक्टूबर को 16 जिलों की 586 जिला परिषद सीटों पर वोट डाले जाएंगे, जहां कुल 1,693 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। यह घमासान केवल वार्ड जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि असली लड़ाई जिला प्रमुख की कुर्सी पर काबिज होने और भाजपा-कांग्रेस के कई कद्दावर नेताओं, मंत्रियों तथा पूर्व मंत्रियों की सियासी साख बचाने की है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP), भारत आदिवासी पार्टी (BAP), बसपा और बड़ी संख्या में उतरे बागी प्रत्याशियों ने कई सीटों पर मुकाबले को बहुकोणीय और बेहद दिलचस्प बना दिया है।

अजमेर जिले में भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए पुरानी बगावत का साया मंडरा रहा है। साल 2020 में 32 में से 21 सीटें जीतने के बावजूद भाजपा क्रॉस वोटिंग और कांग्रेस के समर्थन के चलते अपनी ही बागी सुशील कंवर पलाड़ा को प्रमुख बनने से नहीं रोक पाई थी। इस बार मैदान में पलाड़ा, पूर्व उप जिला प्रमुख हगामी लाल चौधरी और कमलेश गुर्जर डटे हैं, जबकि RLP के 17 और 5 निर्दलीय समीकरण उलझा रहे हैं। यहां भाजपा के कैबिनेट मंत्री सुरेश सिंह रावत और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रघु शर्मा के प्रभाव की सीधी परीक्षा है। उधर सीमावर्ती बाड़मेर में भी 2020 में 18 सीटें जीतने के बाद भाजपा मात खा गई थी और कांग्रेस के महेंद्र चौधरी जिला प्रमुख बने थे। इस बार कांग्रेस से अमीन खान के बेटे शेर मोहम्मद और जिलाध्यक्ष लक्ष्मण सिंह गोदारा ताल ठोक रहे हैं, तो भाजपा से खंगार सिंह सोढा व मनोहर सिंह पापड़ा मैदान में हैं। यहां हरीश चौधरी और मेवाराम जैन के सामने भाजपा के राज्य मंत्री केके विश्नोई, पूर्व केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी और विधायक आदूराम मेघवाल की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।

नए परिसीमन के बाद पहली बार जिला परिषद चुनाव का सामना कर रहे अलवर में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली और पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह का मुकाबला केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और वन मंत्री संजय शर्मा की रणनीति से है। यहां कांग्रेस की ललिता मीणा के सामने भाजपा की संतोष मीणा हैं, जबकि 35 निर्दलीय खेल बिगाड़ने की स्थिति में हैं। भीलवाड़ा में आरएलपी की मौजूदगी के बीच कांग्रेस के पूर्व मंत्री रामलाल जाट व धीरज गुर्जर और भाजपा के कालूलाल गुर्जर की साख जुड़ी है। बीकानेर में परंपरागत रूप से मजबूत कांग्रेस की ओर से पूर्व नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी की पुत्रवधू निकिता डूडी और पूर्व मंत्री गोविंद मेघवाल की बेटी सरिता चौहान मैदान में हैं, जिनका मुकाबला केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल और कैबिनेट मंत्री सुमित गोदारा के असर से है।

आदिवासी बहुल डूंगरपुर में भारत आदिवासी पार्टी (BAP) ने सभी 37 वार्डों पर अपने प्रत्याशी उतारकर मुख्यधारा के दलों के लिए चुनौती खड़ी कर दी है। वर्ष 2020 में कांग्रेस और भाजपा ने मिलकर सूर्या अहारी को निर्दलीय प्रमुख बनाया था, लेकिन इस बार सांसद राजकुमार रोत के प्रभाव के आगे कांग्रेस के पूंजीलाल परमार और भाजपा की अनिता कटारा के सामने सीट बचाए रखने की कड़ी परीक्षा है। वहीं झालावाड़ में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का प्रभाव सीधे तौर पर परखा जाएगा, जहां आप और बसपा के उम्मीदवार भी मैदान में उतरकर ग्रामीण समीकरणों को प्रभावित कर रहे हैं। 22 अक्टूबर को ग्रामीण मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे, जिसके बाद तय होगा कि किस जिले में बागियों की सेंधमारी भारी पड़ती है और कौन जिला प्रमुख की कुर्सी तक पहुंचता है।