23-24 सितंबर की लॉटरी बदलेगी चुनावी गणित: किसकी सीट बचेगी और किसकी बदलेगी
देशभर के ग्रामीण इलाकों में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों और स्थानीय निकाय चुनावों का सरगर्मी भरा दौर शुरू हो चुका है, जिसे लेकर गांवों की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। चुनावों की घोषणा के साथ ही होने वाले आरक्षण और वार्डों के पुनर्गठन (Delimitation) की प्रक्रिया ने भावी प्रत्याशियों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। इस बीच सबसे बड़ी और अहम खबर यह आ रही है कि आगामी 23 और 24 सितंबर को खुलने वाली लॉटरी (Lottery System) ही यह तय करने वाली है कि किस गांव की सीट आरक्षित रहेगी, किसकी अनारक्षित होगी और किस मौजूदा जनप्रतिनिधि की सीट सुरक्षित बचेगी या बदल जाएगी। ग्रामीण राजनीति में प्रधानी, बीडीसी और जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे संभावित उम्मीदवारों की निगाहें पूरी तरह से जिला मुख्यालयों और प्रशासनिक दफ्तरों पर टिकी हुई हैं। नियमों के मुताबिक हर चुनाव चक्र में चक्रानुक्रम (Rotation System) के तहत सीटों का आरक्षण बदला जाता है, ताकि समाज के हर वर्ग को प्रतिनिधित्व का समान अवसर मिल सके। आज के इस विस्तृत लेख में हम आपको 23-24 सितंबर को होने वाली इस महत्वपूर्ण लॉटरी प्रक्रिया, इसके पीछे के प्रशासनिक नियमों और गांवों के सियासी समीकरणों पर पड़ने वाले भारी असर की पूरी और सटीक जानकारी देने जा रहे हैं।
क्या होती है आरक्षण की लॉटरी प्रक्रिया और क्यों है यह ग्रामीण राजनीति का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट?
पंचायती राज व्यवस्था के नियमों के अनुसार हर चुनाव से पहले सीटों के आरक्षण का निर्धारण करना एक अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया होती है, जिसे पूरी तरह से पारदर्शी बनाने के लिए जिला प्रशासन द्वारा लॉटरी या पर्ची पद्धति का सहारा लिया जाता है। इस प्रक्रिया के तहत यह तय किया जाता है कि कौन सी ग्राम पंचायत अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), पिछड़ा वर्ग (OBC) या महिलाओं के लिए आरक्षित होगी और कौन सी सीट पूरी तरह से सामान्य (Unreserved) श्रेणी में आएगी। पिछले कई दशकों से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे दिग्गजों और नए दावेदारों का पूरा राजनीतिक भविष्य इसी दो दिनों की लॉटरी पर टिका होता है। यदि किसी प्रबल दावेदार के गांव की सीट अचानक महिला या किसी अन्य आरक्षित श्रेणी में चली जाती है, तो उसे या तो चुनाव मैदान से हटना पड़ता है या फिर अपने परिवार के किसी अन्य सदस्य को आगे लाना पड़ता है। यही वजह है कि 23 और 24 सितंबर की इन तारीखों को ग्रामीण राजनीति का सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़ माना जा रहा है, जिस पर पूरे गांव की नजरें गड़ी हुई हैं।
मौजूदा प्रधानों और दावेदारों की बढ़ी धड़कनें, प्रशासन ने पूरी की पुख्ता तैयारियां
जैसे-जैसे 23 और 24 सितंबर की तारीख नजदीक आ रही है, गांवों के मौजूदा प्रधानों, जिला पंचायत सदस्यों और संभावित उम्मीदवारों की नींद उड़ चुकी है। सभी लोग अपने-अपने सियासी आकाओं और प्रशासनिक गलियारों में यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इस बार उनके वार्ड या ग्राम पंचायत का भाग्य किस पाले में गिरेगा। जिला प्रशासन के अधिकारियों ने इस पूरी लॉटरी प्रक्रिया को पूरी तरह से निष्पक्ष, पारदर्शी और वीडियो ग्राफ्री की देखरेख में संपन्न कराने के लिए अपनी सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। कलेक्ट्रेट सभागार या विकास भवन में होने वाले इस ड्रा के दौरान सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि और आम ग्रामीण भी मौजूद रहते हैं ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या धांधली की कोई गुंजाइश न बचे। प्रशासन द्वारा ब्लॉकवार और ग्राम पंचायतवार सूची तैयार कर ली गई है, और जैसे ही पर्ची निकलेगी, वैसे ही तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाएगी कि आगामी चुनाव में मैदान में उतरने के लिए कौन पात्र होगा और किसे मायूसी हाथ लगेगी।
गांवों के सामाजिक समीकरणों और चुनावी जोड़-तोड़ पर कैसे पड़ेगा इस फैसले का असर?
ग्राम पंचायत चुनाव केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं बल्कि ग्रामीण भारत के सामाजिक ताने-बाने और आपसी भाईचारे का सबसे बड़ा चुनाव माना जाता है। आरक्षण की यह लॉटरी तय करती है कि आने वाले पांच सालों तक गांव की सत्ता की चाबी किस वर्ग के हाथ में होगी। जिन गांवों में सीटें बदल जाती हैं, वहां नए सिरे से राजनीतिक समीकरण बनने शुरू हो जाते हैं और जातीय आंकड़े नए मोहरे बिछाने लगते हैं। जो लोग पिछले पांच सालों से अपनी सीट को सामान्य मानकर पानी की तरह पैसा बहा रहे थे और जनसंपर्क कर रहे थे, यदि उनका गांव अचानक आरक्षित श्रेणी में चला जाता है, तो उनकी सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है। इसके विपरीत, जो युवा या नए चेहरे कभी राजनीति से दूर थे, उनकी आरक्षित सीट निकलने पर अचानक चांदी हो जाती है और वे रातों-रात गांव के सबसे ताकतवर दावेदार बन जाते हैं। इस तरह यह लॉटरी सिर्फ एक पर्ची नहीं बल्कि दर्जनों परिवारों के राजनीतिक और सामाजिक रुतबे का फैसला करने वाली है।
पर्ची खुलने के बाद शुरू होगा असली घमासान, गांवों में बिछने लगेंगी चुनावी बिसात
23 और 24 सितंबर को जैसे ही लॉटरी के नतीजे घोषित होंगे, वैसे ही उत्तर प्रदेश समेत देश के ग्रामीण इलाकों में चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच जाएगी। जिन लोगों की सीटें सुरक्षित बच जाएंगी, वे तुरंत अपनी जीत का जश्न मनाते हुए और तेज जनसंपर्क में जुट जाएंगे, वहीं जिनकी सीटें बदल जाएंगी वे या तो नए वार्ड की तलाश करेंगे या फिर पर्दे के पीछे से अपने किसी करीबी को समर्थन देने की रणनीति बनाएंगे। इस प्रशासनिक प्रक्रिया के बाद गांवों की चौपालों पर चाय की चुस्कियों के साथ केवल चुनाव और प्रत्याशियों की हार-जीत की चर्चाएं ही मुख्य विषय बन जाएंगी। यह समय यह भी सिखाता है कि राजनीति में कोई भी समीकरण स्थाई नहीं होता और किस्मत का फैसला कभी भी किसी भी दिशा में पलट सकता है। अब सभी की निगाहें प्रशासनिक कमरों से निकलने वाली उन पर्चियों पर टिकी हैं जो आने वाले समय में गांवों की तस्वीर और तकदीर दोनों तय करने वाली हैं।