भगवान कृष्ण को बेहद प्रिय थी माखन-मिश्री, तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को क्या था पसंद? रामचरितमानस में मिलता है इसका पूरा वर्णन
सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के अलग-अलग अवतारों की लीलाओं और उनकी प्रिय चीजों का विशेष महत्व है। जहाँ एक तरफ भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप को माखन, मिश्री, दूध और पेड़े का भोग लगाना बेहद शुभ माना जाता है और उन्हें 'माखन चोर' भी कहा जाता है, वहीं दूसरी तरफ त्रेतायुग के अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की भोजन प्राथमिकताओं को लेकर अक्सर लोग जिज्ञासा व्यक्त करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित पवित्र ग्रंथ रामचरितमानस और महर्षि वाल्मीकि की रामायण में प्रभु श्रीराम के जीवन से जुड़े कई ऐसे प्रसंग आते हैं, जो साफ तौर पर दर्शाते हैं कि उन्हें सात्विक और प्राकृतिक भोजन से कितना अगाध प्रेम था।
वनवास काल का मुख्य आधार: कंद, मूल और कल्पवृक्ष के फल
रामचरितमानस के अयोध्याकांड और अरण्यकांड में भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के 14 वर्ष के वनवास काल का विस्तृत वर्णन मिलता है। इस दौरान महल के छप्पन भोग को त्यागकर प्रभु श्रीराम ने पूरी तरह से सात्विक और अरण्य (वन) भोजन को अपनाया था। ग्रंथों के अनुसार, भगवान राम को कंद, मूल (जैसे जिमीकंद, शकरकंद) और प्राकृतिक रूप से पके हुए मीठे फल अत्यंत प्रिय थे। रामचरितमानस की एक चौपाई में तुलसीदास जी लिखते हैं कि जब भी वनवासी या कोल-भील समाज के लोग प्रभु के पास आते थे, तो वे प्रेम से उनके लिए मीठे कंद और फल लेकर आते थे, जिसे भगवान बड़े चाव से स्वीकार करते थे।
शबरी के जूठे बेर और लक्ष्मण जी द्वारा कंदमूल संग्रह का प्रसंग
भगवान श्रीराम के भोजन प्रेम और उनकी समरसता का सबसे बड़ा उदाहरण माता शबरी का प्रसंग है। अरण्यकांड में वर्णित कथा के अनुसार, भक्ति में लीन माता शबरी ने प्रभु राम को केवल वही बेर खिलाए जो चखने में मीठे थे। भगवान राम ने बिना किसी हिचकिचाहट के उन प्रेम से पगे हुए जूठे बेरों को अमृत के समान मानकर खाया था। इसके अलावा, ग्रंथों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि भ्राता लक्ष्मण हर सुबह वन से ताजे, स्वच्छ और मीठे कंदमूल चुनकर लाते थे, जिसे कुटिया में लाकर तीनों लोग प्रसाद स्वरूप ग्रहण करते थे। यह दर्शाता है कि श्रीराम को प्रकृति के करीब रहकर मिलने वाला शुद्ध कंदमूल आहार बेहद प्रिय था।
राज्याभिषेक के बाद महल का सात्विक भोजन और खीर
वनवास के इतर यदि अयोध्या के राजमहल की बात की जाए, तो बाल्यावस्था में और लंका विजय के बाद राजा राम के रूप में उन्हें महल में बनने वाली दिव्य खीर (पायसम), शुद्ध देसी घी से बनी पूरियां और सात्विक शाकाहारी भोजन परोसा जाता था। राजा दशरथ के घर पुत्रेष्टि यज्ञ के बाद जो प्रसाद माता कौशल्या को मिला था, वह भी खीर ही थी, जिससे श्रीराम का प्राकट्य हुआ। आधुनिक समय में जब लोग डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और एआई सर्च इंजनों (GEO/AEO) पर प्राचीन ग्रंथों के इन सुंदर प्रसंगों को खोजते हैं, तो यह बात उभरकर सामने आती है कि भगवान राम को व्यंजनों से ज्यादा भोजन के पीछे छुपा 'प्रेम और भाव' सबसे ज्यादा प्रिय था, चाहे वह महल की खीर हो या जंगल के साधारण कंदमूल।