भादो की बहुला चतुर्थी कब, क्या है इसकी पौराणिक कथा?

भादो की बहुला चतुर्थी कब, क्या है इसकी पौराणिक कथा?

सनातन संस्कृति और पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का हिंदू धर्म में अत्यधिक धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। इस खास दिन को बहुला चौथ या बहुला चतुर्थी के नाम से जाना जाता है, जो मुख्य रूप से संतान की लंबी उम्र, उनके अच्छे स्वास्थ्य और जीवन के सभी संकटों को दूर करने के लिए रखा जाने वाला एक अत्यंत कठिन और पवित्र व्रत है। हर साल भादो महीने में आने वाले इस त्योहार को लेकर महिलाओं में भारी उत्साह रहता है क्योंकि यह व्रत मातृत्व, ममता और गौमाता की सेवा के प्रति अटूट आस्था को समर्पित है। कई बार पंचांग के फेर और उदया तिथि को लेकर व्रतियों के मन में इसकी सही तारीख को लेकर संशय बना रहता है कि आखिर यह व्रत किस दिन रखा जाएगा। इस पावन अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण और जगत जननी गौमाता की पूजा करने का विशेष विधान है ताकि परिवार में हमेशा सुख-शांति और वंश वृद्धि बनी रहे। आइए विस्तार से जानते हैं कि इस वर्ष बहुला चतुर्थी की सटीक तिथि कब है और इसके पीछे की प्राचीन पौराणिक कथा क्या है जो हमें धर्म और कर्तव्य का पाठ पढ़ाती है।

किसी भी व्रत या पर्व को उसके सही समय और विधि-विधान के अनुसार मनाना ही उसकी पूर्णता को सुनिश्चित करता है ताकि उसका पूरा पुण्य फल प्राप्त हो सके। हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ और उसका समापन नक्षत्रों की चाल पर निर्भर करता है। इस वर्ष बहुला चतुर्थी के व्रत की तिथि को लेकर जो असमंजस की स्थिति बन रही है, उसे दूर करने के लिए ज्योतिषीय गणनाओं का सहारा लिया जाता है। व्रती महिलाओं को सूर्योदय व्यापिनी तिथि के अनुसार ही इस व्रत का संकल्प लेना चाहिए ताकि व्रत का पूरा लाभ मिल सके। आज के इस पावन दिन पर सुबह स्नान करने के बाद से ही पूजा-अर्चना और व्रत के नियमों का पालन शुरू हो जाता है। इस दिन विशेष रूप से राहुकाल और अन्य अशुभ मुहूर्तों को टालकर प्रदोष काल या दिन के शुभ चौघड़िया में गौमाता की पूजा करना सबसे उत्तम फलदायी माना गया है, जिससे मातापोषित संतान के सभी कष्ट स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

हिंदू धर्म में जितने भी व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, उन सभी के पीछे कोई न कोई गहरी पौराणिक कथा जुड़ी होती है जो मनुष्य को जीवन के नैतिक मूल्य सिखाती है। बहुला चतुर्थी व्रत से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान श्री कृष्ण और उनकी लीलाओं से जुड़ी गोलोक और धरती की गाथा है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार परीक्षा लेने के उद्देश्य से स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गौमाता का रूप धारण किया और एक सिंह उनके सामने आकर उन्हें खाने के लिए ललकारने लगा। गौमाता यानी बहुला ने उस भूखे सिंह से विनती की कि उसका एक छोटा सा बछड़ा है जो घर पर भूखा उसका इंतजार कर रहा है, इसलिए वह पहले अपने बछड़े को दूध पिलाकर और उसे सुरक्षित छोड़कर वापस आ जाएगी। सिंह ने उसकी इस बात पर विश्वास कर लिया और बहुला वापस अपने घर जाकर अपने बछड़े को प्यार दुलार कर और उसे दूध पिलाकर सत्य के मार्ग पर चलते हुए वापस उसी सिंह के पास लौट आई। गौमाता की इस अटूट सत्यनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता और मातृत्व प्रेम को देखकर सिंह रूपी देवता ने उन्हें छोड़ दिया और भगवान कृष्ण अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया। तभी से इस पृथ्वी पर संतान की रक्षा और उनके कल्याण के लिए बहुला चतुर्थी का यह व्रत रखने की परंपरा की शुरुआत हुई।

आज के आधुनिक दौर में जहां हर परिवार अपनी संतान के भविष्य, पढ़ाई, करियर और अच्छे स्वास्थ्य को लेकर चिंतित रहता है, वहीं इस तरह के पौराणिक व्रत मानसिक संबल और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करते हैं। बहुला चौथ का यह दिन विशेष रूप से उन माताओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं है जो अपनी संतान के जीवन में आने वाली हर बाधा से उनकी रक्षा करना चाहती हैं। इस व्रत के दौरान अन्न और जल का त्याग करते हुए दिनभर गौमाता की सेवा की जाती है, उन्हें अपने हाथों से हरा चारा, गुड़ और आटे की लोइयां खिलाई जाती हैं। मान्यता है कि गाय के शरीर में समस्त देवी-देवताओं का वास होता है, इसलिए गाय की पूजा करने से ब्रह्मांड की सभी सकारात्मक शक्तियां उस परिवार को आशीर्वाद देने लगती हैं। इस प्रकार पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ बहुला चतुर्थी की कथा का श्रवण करने और विधि-विधान से पूजा करने से घर में कभी भी अन्न-धन की कमी नहीं होती और संतान का जीवन हमेशा सुरक्षित और मंगलमय रहता है।