अष्टमी और नवमी तिथि का कन्या पूजन कब करें? दूर करें सारा कंफ्यूजन
शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri) का पावन पर्व हिंदू धर्म में सबसे बड़े और महत्वपूर्ण उत्सवों में शुमार किया जाता है, जिसमें मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की नौ दिनों तक विधि-विधान के साथ आराधना की जाती है। नवरात्रि के इन दिनों में अष्टमी और नवमी तिथि का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना जाता है, क्योंकि इन दोनों ही पवित्र दिनों पर मां दुर्गा के भक्तों द्वारा कंजक या कन्या पूजन (Kanya Pujan) करने की प्राचीन परंपरा चली आ रही है। लेकिन इस बार पंचांग की गणना और तिथियों के फेरबदल के कारण देश भर के श्रद्धालुओं के मन में एक बड़ा असमंजस और कन्फ्यूजन बना हुआ है कि आखिर महाअष्टमी और महानवमी का कन्या पूजन किस दिन करना सबसे ज्यादा शुभ और फलदायी रहेगा। कुछ लोग इसे लेकर असमंजस में हैं कि पूजन 18 अक्टूबर को करें या 19 अक्टूबर को। आइए एक धर्म और पंचांग विशेषज्ञ रिपोर्टर की नजर से गहराई से जानते हैं कि इस साल कन्या पूजन की सटीक तारीख, समय और शुभ मुहूर्त क्या है।
पंचांग के अनुसार क्या है अष्टमी और नवमी तिथि का सही गणित और समय?
हिंदू पंचांग की गणना के मुताबिक, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ होता है और इसके तुरंत बाद नवमी तिथि शुरू होती है। इस वर्ष उदयातिथि और तिथियों के क्षय व वृद्धि के समीकरण के कारण लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि व्रत का पारण और कन्या पूजन कब किया जाए। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, जो श्रद्धालु महाअष्टमी के दिन व्रत रखकर कन्याओं को जिमाते हैं और जो महानवमी के दिन हवन व पूजन के बाद अपना व्रत खोलते हैं, उनके लिए तिथियों का यह संयोजन बहुत ही महत्वपूर्ण है। पंचांग के जानकारों का कहना है कि उदयातिथि के नियमों को ध्यान में रखते हुए ही मां दुर्गा की आराधना और कन्याओं का भोज तय किया जाना चाहिए ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।
महाअष्टमी का कन्या पूजन कब है और इसके लिए कौन सा समय रहेगा सबसे श्रेष्ठ?
जो परिवार और श्रद्धालु दुर्गा अष्टमी (Durga Ashtami) के अवसर पर अपने घरों में कन्या पूजन करने का विधान रखते हैं, वे पंचांग की स्थिति को स्पष्ट रूप से समझ लें। इस बार अष्टमी तिथि के सूर्योदय के प्रभाव और उसके समापन के समय को देखते हुए कन्या पूजन के लिए सुबह का समय सबसे उत्तम माना गया है। यदि आप अष्टमी के दिन कन्या पूजन कर रहे हैं, तो सुबह के ब्रह्म मुहूर्त, अमृत काल या फिर अभिजीत मुहूर्त के दौरान माता का ध्यान करके कन्याओं को आमंत्रित कर सकते हैं। इस दौरान माता महागौरी की विधि-विधान से पूजा की जाती है और नौ कन्याओं के साथ एक छोटे बालक (जिसे बटुक भैरव या लांगुर माना जाता है) को भोजन कराया जाता है।
महानवमी पर कन्या पूजन और हवन का सही मुहूर्त क्या है?
कई घरों और परंपराओं में महानवमी (Maha Navami) के दिन हवन संपन्न करने के बाद ही कन्या पूजन और व्रत का पारण करने की परंपरा होती है। नवमी तिथि के प्रारंभ होने के बाद ही हवन और कन्याओं को भोजन कराने का विधान है। जो लोग नवमी तिथि पर कन्या पूजन करना चाहते हैं, वे पंचांग के अनुसार नवमी के शुभ मुहूर्त में ही मां सिद्धिदात्री की पूजा के पश्चात कंजक बिठाएं। ध्यान रहे कि व्रत का पारण हमेशा हवन और कन्या पूजन संपन्न होने के बाद ही किया जाता है, जिससे नौ दिनों की साधना पूरी होती है।
कन्या पूजन की संपूर्ण विधि और किन बातों का रखना चाहिए विशेष ध्यान?
माता रानी को प्रसन्न करने वाले इस पावन अनुष्ठान में कुछ नियमों का पालन करना बेहद जरूरी होता है। जब कन्याएं आपके घर पधारें, तो सबसे पहले उनका स्वागत फूलों की वर्षा करके करें। इसके बाद एक साफ थाली में उनके चरण रखकर अपने हाथों से उनके पैर धुलाएं और उनका आशीर्वाद लें। इसके बाद सभी कन्याओं और बटुक को आदर के साथ अपने आसन पर बैठाएं। उनके माथे पर कुमकुम, रोली और अक्षत का तिलक लगाएं तथा कलाई पर रक्षा सूत्र (कलावा) बांधें। इसके बाद उन्हें पूरी, सूजी का हलवा और काले चने का सात्विक प्रसाद श्रद्धा के साथ परोसें। भोजन के उपरांत अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन्हें उपहार, फल या दक्षिणा दें और उनके चरण छूकर विदाई लें। इस तरह विधि-विधान से किया गया कन्या पूजन आपके घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास लेकर आता है।