Up kiran,Digital Desk : तमिलनाडु के कांचीपुरम स्थित श्री देवराजस्वामी मंदिर में पूजा-पद्धति को लेकर चल रहे 120 साल पुराने विवाद में अब सुलह की उम्मीद जगी है। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की सहमति से पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल (एसके कौल) को मुख्य मध्यस्थ नियुक्त किया है। अदालत का मकसद है कि लंबे समय से चले आ रहे धार्मिक विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान निकले और मंदिर में पूजा शांति से जारी रहे।
विवाद की जड़ें: थेंगलाई बनाम वडकलई
मामला श्रीवैष्णव समुदाय के दो संप्रदायों – थेंगलाई और वडकलई – के बीच मंदिर के गर्भगृह में मंत्रोच्चार और पूजा-अनुष्ठान को लेकर है। थेंगलाई संप्रदाय परंपरागत रूप से मंदिर में पूजा करता आया है। वडकलई पक्ष का कहना है कि उन्हें भी पूजा में भाग लेने का अधिकार है, लेकिन उन्हें रोका जा रहा है। मद्रास हाईकोर्ट ने वडकलई की याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ शीर्ष अदालत में अपील चल रही थी।
मध्यस्थता का रास्ता क्यों चुना गया?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने दोनों पक्षों की सहमति के आधार पर मध्यस्थता का निर्णय लिया। अदालत ने कहा कि पूर्व न्यायाधीश एसके कौल, जो मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी रह चुके हैं, इस विवाद को सुलझाने के लिए उपयुक्त हैं। उन्हें तमिल और संस्कृत के जानकार दो अन्य व्यक्तियों को सहयोग देने की अनुमति भी दी गई है। अगली सुनवाई 13 मार्च तय की गई है।
हाईकोर्ट का रुख और कानूनी तर्क
दिसंबर में मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ ने थेंगलाई समुदाय के मंदिर में मंत्रोच्चार के मिरासी अधिकार बरकरार रखे। अदालत ने माना कि मौजूदा पूजा परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और वडकलई को अलग मंत्र पढ़ने की अनुमति देने से पहले से स्थापित आदेशों का उल्लंघन होगा।
वडकलई पक्ष का तर्क है कि अनुच्छेद 25 के तहत सभी धार्मिक संप्रदायों को पूजा में समान अधिकार मिलने चाहिए। उनका कहना है कि 1971 के तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम के बाद वंशानुगत अधिकार कानूनी रूप से समाप्त हो चुके हैं।
परंपरा बनाम समावेशन
थेंगलाई संप्रदाय की परंपरा 300 वर्षों से अधिक पुरानी है और मंदिर की पहचान से जुड़ी है। कोविड काल में दोनों पक्षों को अस्थायी रूप से अपने मंत्र पढ़ने की अनुमति मिली थी, लेकिन बाद में प्रशासन ने इसे बंद कर दिया। वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने ‘भाईचारे’ के संवैधानिक मूल्य को रेखांकित किया और सुलह को मुकदमेबाजी से बेहतर विकल्प बताया।
मध्यस्थता से यह तय होने की उम्मीद है कि परंपरा और समान अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बने। अदालत ने संकेत दिया कि यदि सुलह से समाधान निकलता है तो दशकों से चला आ रहा टकराव समाप्त हो सकता है।
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